सृष्टि विरूद्ध संघर्ष में, सिद्धता असंभव प्राकृतिक संस्कृति, संस्कार, शिक्षा, आधारित सभ्यता, समृद्ध, समर्थ, जीवन में अहम

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जीवन को सुन्दर, सरल, सार्थक, समृद्ध बनाने में हमारा प्राकृतिक, नैसर्गिक स्वभाव, रचना और सभ्यता अनुकूल संस्कृति, संस्कार, शिक्षा अहम होती है। मगर जब हम समृद्ध, सार्थक, सफल, खुशहाल जीवन के लिए सृष्टि में प्रकृति के विरूद्ध स्वार्थवत समूह या व्यक्तिगत तौर पर संघर्ष करते है। तो अन्नतपूर्ण समस्याओं से ग्रस्त हो, हम एक ऐसा समाज और सामाजिक वातावरण तैयार करते है। जो संपन्न, समृद्ध, सुसंस्कृत, सरल जीवन में बाधक होता है। आज अच्छी-सच्ची शिक्षा संस्कारों से इतर प्रकृति के विरूद्ध हमारे जो स्वार्थवत आचरण का परिणाम है जिसके चलते हम एक ऐसी कत्र्तव्य विहीन धारा के सार्थी सहयोगी, सहभागी बन रहे है जो अनन्त है।
शायद यहीं प्रकृति विरूद्ध स्वार्थवत स्वभाव हमारी समस्त समस्याओं की जड़ है। जिससे सचेत होना हमारा कत्र्तव्य होना चाहिए। जिसकी शुरूआत व्यक्ति, परिवार, समाज से हो सकती जो यह सुनिश्चित करे कि व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्थाओं, संगठनों का मूल कत्र्तव्य प्रकृति अनुकूल कत्र्तव्य निर्वहन व सृजन में अपनी सार्थकता निष्ठापूर्ण सिद्ध कर मानवीय जीवन ही नहीं, समूचे जीव-जगत की समृद्धि, खुशहाली, सृजन में सुनिश्चित हो, क्योंकि व्यवहारिक हकीकत यह है कि बच्चों को प्रतिभा निखारने स्वस्थ शरीर संसाधन तथा जीवन्त शिक्षा के लिए प्रखाण्ड शिक्षक, संस्थान चाहिए। युवाओं को सार्थक, सफल, समृद्ध, खुशहाल जीवन के अवसर तो बुजुर्गो को सम्मानजक, शेष जीवन निर्वहन के लिए संरक्षण चाहिए, जो स्वराज के सिद्धान्त से संभव है। जिसमें सृजन से लेकर सार्थकता के सुगम मार्ग हो सकते है। जिसमें प्रकृति की विविधता के साथ सृष्टि में नैसर्गिक गुण अनुसार अवसर, प्रदर्शन, समर्पण और मौजूद समस्याओं का समाधान छिपा है।
मगर यह तभी संभव है जब हम अपने निहित स्वार्थ के साथ सर्वकल्याण के लिए प्रकृति अनुरूप विभिन्न आडम्बरों भ्रामक टी.व्ही., अखबार, भाषण, निर्जीव सोशल मीडिया के आक्रमण को रोक स्वयं के जीवन को जीवन्त, सार्थक, सफल, समृद्ध, खुशहाल बनाये और 2019 लोकसभा में यहीं अहम मुद्दे होने चाहिए न कि निहित स्वार्थ, तत्कालिक व्यक्तिगत, जाति, धर्म, वर्ग, आधारित मुद्दे या लाभ क्योंकि आजादी के बाद स्वराज की जगह लोकतंत्र की आढ़ में जो पंूजीबादी, साम्राज्यवादी ताकते विचार, दल, संगठन, संस्था, परिवार, व्यक्ति के रूप में समृद्ध, समर्थ है वह कभी नहीं चाहेगी कि आम गांव, गली, गरीब की सत्ता, संसाधनों पर भागीदारी सुनिश्चित हो। शायद यहीं दर्द हमें अपने निहित स्वार्थो के चलते नासूर बन चुका है। जिसका निदान भी हमें ही करना है वह भी स्वयं के वोट की ताकत से और अपने प्राकृतिक नैसर्गिक गुण सामर्थ के आधार पर।
जय स्वराज  

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