राष्ट्र में प्रतिभा, संसाधन, सामर्थ, पुरुषार्थ की कमी नहीं, यह प्रमाण है



व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
शिक्षा, संस्कृति, संस्कार विहीन सियासत और स्वार्थवत माहौल के बीच जो सुपर पावर की सिद्धता भले ही आज साबित हुई हो। मगर हम भारत वर्ष के लोगों की प्रमाणिकता, सिद्धता अनादिकाल से रही है फिर उसके रूप स्वरूप जो भी रहे हो, कर्म क्षेत्र जो भी रहे हो। आज भी भारतवर्ष की सहजता, संघर्ष, सफलताएं विश्व के समूचे भूभाग पर अपने जीवन निर्वहन करते लोगों के रूप में हमारे सामने हैं। यह सृष्टि में जीवन निर्वहन की अकाटय प्रमाणिकता ही है। जो पृथ्वी के पूर्वी छोर से लेकर पश्चिमी छोर तक और उत्तरी छोर से लेकर  दक्षिणी छोर तक जिस तरह से भारतवर्ष के लाग संघर्ष त्याग स्वयं कल्याण के साथ सर्व कल्याण के लिए जीवन निर्वहन करते मिल जाएगें, फिर उन देशों के नाम, संस्कृति, भाषा, बोली, सामाजिक वातावरण जो भी हो।
दूसरा प्रमाण भारतवर्ष के महानतम लोगों का यह है कि सैकड़ों वर्षों से लुटे पिटे शोषित राष्ट्र के रूप में हमने जब आजाद राष्ट्र के रूप में शुरूआत कर, जो संघर्ष कर स्थाई नीव रखी, उसी का परिणाम है कि हमारी दिशा दशा जो भी रही हो। मगर हमने हमारा पुरुषार्थ, सामर्थ कभी नहीं खोया। ये अलग बात है कि समय परिस्थिति अनुसार स्पष्ट दिशा दशा तय करने में हमें 70 वर्ष का समय लगा हो, मगर हमारा सामर्थ, पुरुषार्थ आज भी यथावत है।
आज जब हम गांव, गली, गरीब के लिए स्थापित राज पंचायती, नगरीय के साथ विकास के क्षेत्र में ऑटोमोबाइल, कंप्यूटर क्रांति सहित भूमि अधिग्रहण, सूचना, खाद्य, रोजगार गारंटी सहित परमाणु अधोसंरचना निर्माण के साथ सेवा, सुविधा, कल्याण के क्षेत्र में तथा महाशक्तियों की श्रंखला में अपना नाम जोड़ अपने बन्धुत्वों को विश्व भर में जोड़ने की ओर आर्थिक आधार पर अग्रसर है। यह भी हमारा पुरुषार्थ, सामर्थ है। मगर जिस तरह से हम शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, संस्कार, रोजगार और सहज अवसरों सहित संपदा के मोर्चे पर असफल, अक्षम, साबित हो रहे हैं यह विचारणीय प्रश्न होना चाहिए। कहते है कि स्वार्थ मनुष्य का नैसर्गिक, प्रकृति, संपदा प्रदत्त गुण हो सकता हैं। मगर निहित स्वार्थ पूर्ति के साथ सर्वकल्याण हमारी महान संस्कृति का भाग है। जो सृष्टि ही नहीं प्राकृतिक सिद्धांत की सिद्धता साबित करने काफी है। जरूरत आज सक्षम, सफल, समर्थ, समृद्ध, सियासत, सत्ता, संगठन, संस्था, व्यक्तियों की है। जो सजग रह, स्वयं परिवार, समाज, संस्था, संगठन, संस्थाओं को सही सार्थक दिशा दे, उन्हें सामर्थ बना, मार्गदर्शित कर सके। यहीं हमारी विरासत की वह मूल पहचान है।

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