जीत के जघन्य जुनून में स्वाहा होती सियासत सच से संघर्ष करते सियासी दल
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
हालिया विगत 20 वर्षो में घटे दो घटनाक्रमों पर नजर डाले तो वह जीवन का सच समझने काफी है। यह ऐसे दो सच है जो सार्थक भी हुए और सफल रहे। जिनकी सिद्धता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। जिसमें पहला उदाहरण धनाड्य, परिवार, बिड़ला से जुड़ा है। स्व. आदित्य बिरला एक ऐसी शख्सियत थेे जिन पर न तो धनी की कमी थी न ही संसाधनों की। यहां गौर करने वाली बात यह है कि जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तो वह विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के वाॅशिंगटन जैसे शहर में थे जहां विश्व की सर्वोत्तम चिकित्सा उपलब्ध थी। मगर एक बुखार ने मात्र 48 घंटे में सबकुछ समाप्त कर दिया। दूसरा उदाहरण गोआ के पूर्व मुख्यमंत्री देश के रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर से जुड़ा है। जिन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से अमेरिका में ही चिकित्सा लाभ लेने के दौरान अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा था कि आज मैं एक सक्षम, सफल, समर्थ व्यक्ति हूं। जिसके साथ संसाधन, सहयोगी, शुभचिन्तक सभी है। मगर मैं एक बैवस लाचार मौत का इंतजार करता वह व्यक्ति हूं जिसको पता है कि उसकी मौत सुनिश्चित है और आज जिस दर्द और बीमारी से उनका संघर्ष चल रहा है उसके बीच कोई नहीं। शायद इससे बड़ा सच आज के समय में समझने और कोई हो नहीं सकता। काश इस सच को जीत के जुनून में अंधे वह सियासी लोग समझ पाये और अपने कत्र्तव्य, निर्वहन को निष्ठापूर्ण सृजन में लगा पाये, तो यह मानवीय सभ्यता की सबसे बड़ी कृति और सिद्धि होगी।
जय स्वराज
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