समय के आगे नतमस्तक दल
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
विश्व में जब काॅग्रेस विचार लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार बना, तब मौजूद शसक्त या सत्ताधारी दलों का बजूद तो दूर जन्म तक नहीं हुआ होगा। क्योंकि काॅग्रेस का मूल आधार अहिंसा और सर्वकल्याण समान अवसर और निष्छल स्वतंत्रता रही है। मगर जहां-जहां जब-जब काॅग्रेस का मूल आधार कमजोर जर-जर या अपनी मूल पहचान से इतर हो जर-जर हुआ वहां-वहां उसका न तो आधार और न ही उसका नामो निशान बचा। जहां से अन्य विचार, विचारधारा से युक्त दलों का जन्म हुआ। ये अलग बात है कि वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में संगठनात्मक तौर पर कभी सवाल भी रहे और सत्ताये भी हासिल की और एक मर्तवा फिर से वह अब अपनी पूर्व पहचान व अस्तित्व तथा स्थायित्व के लिए संघर्षरत है। अगर आज भारत में काॅग्रेस विचार के धुर विरोधी या काॅग्रेस के पद चिन्हों पर अलग पहचान बना सत्ता सुख भोग रहे वह दल, संगठनात्मक आधार पर शसक्त और काॅग्रेस से विमुख है। तो यह कमजोरी काॅग्रेस के नाम मौजूद उस संगठन दल, संस्थाओं की है। जो अपने अस्तित्व को संरक्षित नहीं रख सके तो आज किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि जो आवोहवा आज काॅग्रेस के विरोध में है।
मगर यह सम्पूर्ण सच नहीं जिसका अचूक अस्त्र अहिंसा हो। वह लक्ष्य न भेद पाये यह सम्भव नहीं। मगर व्यवहारिक पृष्ठभूमि समय चक्र साक्षी है कि जो कर्म करते है प्रतिफल की प्राप्ति भी उन्हीं को होती है। अगर देश में मोदी-मोदी का समय है तो शेष लोगों की सार्थकता है कि वह पूर्ण निष्ठा से अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर अपनी पहचान स्थापित कर जो संगठन सत्ता ही नहीं, व्यक्ति, विशेष के आचरण, व्यवहार को भी सुशोभित कर स्वयं की सार्थकता सिद्ध करे, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मजबूत बनाया जा सके।
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