सफलता, सिद्धता, सीख, समझ व समर्पित सारथी, विद्ववान, सलाहकारों पर निर्भर करती है सक्षम, समर्थ, सेवाभावी नेतृत्व ही ला सकता है समृद्ध ही खुशहाली सच से मुंह छिपाते सरोकार प्रमाण-प्रमाणिकता का अभाव अस्तित्व ही आधार का संकट


व्ही.एस.भुल्ले 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
पहले स्वयं की पहचान फिर राष्ट्रवाद के अगुवा बने संगठन आज भले ही राष्ट्रवादी विचारधारा को समयकाल परिस्थिति अनुसार संख्या बल के आधार पर पहले पायदान पर स्वयं को मानते हो। मगर उससे अन्य किसी राष्ट्रीय विचारधारा का अस्तित्व खत्म नहीं हो जाता।
ये अलग बात है कि समय परिस्थिति अनुसार उसे तमगा जो भी मिला हो। मगर क्षेत्रीय स्तर पर निहित मुद्दों की बैसाखियों पर खड़े दल भले ही सत्ता में हो। मगर उनका राष्ट्रीय आधार नहीं हो सकता। यह समझने वाली बात होनी चाहिए। मगर जिस तरह से बन्धन-गठबन्धन का दौर सहमति, असहमति के आधार पर निहित स्वार्थ बस शुरू हुआ है वह न तो समाज हित में है, न ही राष्ट्र हित में है, यह राष्ट्रीय दलों को समझने वाली बात होनी चाहिए। मगर महान लोकतंत्र में सबकुछ चल रहा है। बेतहर हो कि राष्ट्रीय दल अपने अस्तित्व, आधार सेवा, सर्वकल्याण को अन्तिम लक्ष्य समझें, न कि जुनून के रथ पर सवार जीत का ध्वज लिए संस्कार विहीन भाषा शैली के अस्त्र एक दूसरे पर दागे। क्योंकि अनादिकाल से जीवन सृजन से जुड़े अहम मुद्दे किसी लक्ष्य को भेदने में सक्षम, सफल हुए है।
जय स्वराज

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