लोकतंत्र में राष्ट्र-जन, कल्याण से बढ़कर कोई धर्म नहीं
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब आम जन व राष्ट्र अपने विधान की कीमत पर संविधान को अंगीकार करता है तो उसका कत्र्तव्य जबावदेही उसका धर्म होता है। जिसके बिना पर अपने नैसर्गिक अधिकारों की पूर्ति मौजूद व्यवस्था से पारितोष के रूप में चाहता है। फिर व्यवस्था जो भी हो, अगर राजधर्म का पालन न हो और कत्र्तव्य जबावदेही व्यवस्था की मोहताज हो, ऐसे में उस लोकतंत्र की सार्थकता, सिद्धता पर सवाल होना स्वभाविक है। जो किसी भी स्वस्थ, सशक्त, सार्थक लोकतंत्र के लिए शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी है। यह एक कड़वा सच हो सकता है बैसे भी जब राष्ट्र-जन कल्याण मूक और सत्ता स्वार्थवत और अहंकारी हो, तो ऐसे में राजधर्म की कल्पना बैमानी हो जाती है। बेहतर हो कि राष्ट्र-जन इस कटु सच को समझ आने वाले समय में सार्थक निर्णय ले और अपने कर्म, धर्म, जबावदेही की सिद्धता-सिद्ध कर 2019 में अपने वजूद का ऐहसास करा एक सच्चे और अच्छे नागरिक होने की सिद्धता, सिद्ध करें। तभी हम इस महान भू-भाग के महान नागरिक कहला पायेगें।
जय स्वराज
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