रण छोड़, नीत पर सवाल 2 कदम आगे फिर 4 कदम पीछे की रणनीत आखिर कितनी कामयाब होगी
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि दो कदम आगे चार कदम पीछे पीछे रणनीत कितनी सफल, असफल होती है। मगर यह समृद्ध राजनीति और लोकतांत्रिक, परम्परा का सम्पूर्ण सच नहीं। विगत दो दशक में देश में जिस तरह से देश के सबसे पुराने दल ने क्या खोया क्या पाया सभी के सामने है। मगर गलतियों से सीख न ले पाना नादानी ही कहा जायेगा। परिणाम कि स्वयं के स्वार्थ छोड़ उसके पास न तो समर्पित कार्यकत्र्ता है, न ही वह खाटी नेता जिन पर विश्वास कर आम नागरिक झण्डा उठा सके। सर्वकल्याण, त्याग, बलिदान को समर्पित संगठन का सच यह है कि शनै, शनै वह स्वयं ही अपने कृत्यों के चलते निस्तनाबूत होने के कगार पर जा रहा है। जिसकी न तो कोई नीति शेष रही, न ही रणनीत बल्कि रणक्षोर वीरों में तब्दील यह महान दल, शायद अपने अन्तिम पड़ाव पर है। जिसकी शर्मनाक विदाई भर शेष है। कहते है जिसके कोई मूल्य सिद्धान्त सरोकार, नही होते वह स्वतः ही समाप्त हो जाता है। खासकर युद्ध के मैदान में जिस सेनापति के शौर्य पर सैनिकों की आशा उम्मीद होती है। अगर वह रण छोड़ बन जाये तो जीत हार का अर्थ समझा जा सकता है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि दो कदम आगे चार कदम पीछे पीछे रणनीत कितनी सफल, असफल होती है। मगर यह समृद्ध राजनीति और लोकतांत्रिक, परम्परा का सम्पूर्ण सच नहीं। विगत दो दशक में देश में जिस तरह से देश के सबसे पुराने दल ने क्या खोया क्या पाया सभी के सामने है। मगर गलतियों से सीख न ले पाना नादानी ही कहा जायेगा। परिणाम कि स्वयं के स्वार्थ छोड़ उसके पास न तो समर्पित कार्यकत्र्ता है, न ही वह खाटी नेता जिन पर विश्वास कर आम नागरिक झण्डा उठा सके। सर्वकल्याण, त्याग, बलिदान को समर्पित संगठन का सच यह है कि शनै, शनै वह स्वयं ही अपने कृत्यों के चलते निस्तनाबूत होने के कगार पर जा रहा है। जिसकी न तो कोई नीति शेष रही, न ही रणनीत बल्कि रणक्षोर वीरों में तब्दील यह महान दल, शायद अपने अन्तिम पड़ाव पर है। जिसकी शर्मनाक विदाई भर शेष है। कहते है जिसके कोई मूल्य सिद्धान्त सरोकार, नही होते वह स्वतः ही समाप्त हो जाता है। खासकर युद्ध के मैदान में जिस सेनापति के शौर्य पर सैनिकों की आशा उम्मीद होती है। अगर वह रण छोड़ बन जाये तो जीत हार का अर्थ समझा जा सकता है।
जय स्वराज

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