न्याय, संकल्प, आधार अस्तित्व की संभावनाओं की तू-तू, मैं-मैं के बीच अनुतरित रहे यक्ष सवाल
व्ही.एस.भुल्ले
विेलेज टाइम्स समाचार सेवा।
91 लोकसभा सीटों पर प्रथम चरण के मतदान शुरू होने के साथ ही और न्याय, संकल्प, आधार अस्तित्व की संभावनाओं की तू-तू, मैं-मैं के बीच यह अलग बात है कि राष्ट्र-जन से जुड़े यक्ष सवाल आज भी अधूरे है। जबकि 6 चरणों में 543 लोकसभा सीटों में से शेष बची सीटों पर मतदान होना अभी शेष है।
यह भी अलग बात है कि इस महान राष्ट्र और लोकतंत्र का मिजाज समृद्धि, खुशहाली को लेकर कहीं अल्हड़, मदमस्त, तो कहीं स्वाभिमानी, न्याप्रिय है, तो वहीं इस महान राष्ट्र-जन का भोलापन उसका अनुवांशिक और विरासत का गुण और उसकी पहचान भी है। मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी का अंतिम लक्ष्य सर्वकल्याण, समृद्ध, खुशहाल और अवसरों से परिपूर्ण स्वच्छंद जीवन होता है। जिस संस्कृति का अंतिम सत्य अहिंसा हो, उस समाज में, उस व्यवस्था में अहम मुद्दों का अहम मौकों पर चर्चा विहीन हो जाना कभी न खत्म न होने वाली समस्या व संकटों के संकेत है। कहते है कि हमारी महान संस्कृति का सर्वकल्याण मूल आधार है। जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, एक दूसरे के प्रति सामूहिक, सहयोग, समर्पण हमारे संस्कारों की सिद्धता रही है। जिसमें सर्व भाव सिद्ध करने सहयोग देने-लेने की परम्परा वह भी मानवीय आधार पर निःस्वार्थ पूर्ण ढंग से करने की रही है। फिर वह व्यक्ति, परिवार, समाज, राजनीति, सत्ता जो भी रही हो। हमारा यह मूल संस्कार हमेशा से जीवंत रहा है।
मगर सैंकड़ों वर्षो से आक्रान्ताओं के निहित स्वार्थो के चलते सैया पर तड़पती हमारी महान शिक्षा, संस्कृति, आध्यात्म जिसके गर्भ में हमारे महान संस्कार, अवसर, संरक्षण, सम्बर्धन जैसी संततियां, सृष्टि में मौजूद जीवन की सहभागी हुआ करती थी। मगर दुर्भाग्य कि न तो हम उनका संरक्षण कर पाए, न ही उन्हें सुरक्षित रख पाये। परिणाम कि विगत 300 वर्षो में ही नहीं, विगत 70 वर्ष बाद भी आज हम संस्कारिक आधार पर निस्तानाबूत होने के कगार पर है और हमारी महान शिक्षा, संस्कृति, प्रतिभायें भ्रूर्ण हत्या की ओर अग्रसर है।
आज जब सेवा, कल्याण निर्माण के नाम जिस तरह से ईमानदार, कत्र्तव्यनिष्ठ, संघर्षशील नागरिकों से टेक्स के रूप में प्राप्त धन व राष्ट्र संपदा, संसाधनों, प्रतिभाओं से प्राप्त धन को वोटों के लिए सत्ता के स्वार्थवत मनचाहे ढंग से कहीं न्याय, संकल्प, अस्तित्व आधार के लिए उलीचने के उदाहरण वह भी न तो कोई स्पष्ट विजन और डीपीआर के संभावनाओं के रथ पर सत्ता की ध्वजा लहरा सत्ता हासिल करने लोग निकले है। इससे न तो उस महान राष्ट्र और न ही उस राष्ट्र के भोले-भाले स्वाभिमानी लोगों का भला होने वाला है। यह इस महान राष्ट्र के हर मतदाता व नागरिकों को समझने वाली बात होनी चाहिए।
कहते है कि किसी भी संप्रभू, सशक्त, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र का आधार उसकी शिक्षा और उस राष्ट्र की संस्कृति के साथ निवासरत नागरिकों में निहित होता है। फिर व्यवस्था राजतांत्रिक रही हो या लोकतांत्रिक हो। आज जब लोकतांत्रिक व्यवस्था में पहले चरण का मतदान जारी है और शेष 6 चरण का मतदान होना शेष। ऐसे में परिणाम विहीन मुद्दे व स्वार्थवत तू-तू, मैं-मै के बीच किसी भी सभ्य समाज को दर्द और दुःख होना स्वभाविक है। शर्मनाक है ऐसे मौकों पर सत्ता हासिल करने राष्ट्र-जन के मान-सम्मान, स्वाभिमान और उसकी प्रतिष्ठा को दांव लगा न्याय, संकल्प, अस्तित्व, आधार संभावनाओं के लिए लड़ी जाने वाली वह चुनावी जंग। ऐसे में सबसे बड़ी जबावदेही इस महान राष्ट्र के भोले-भाले, कत्र्तव्यनिष्ठ, निष्ठावान, जबावदेह उन युवा, बुजुर्ग, नागरिकों की जिनकी मौजूद या आने वाली पीढ़ियां अपने समृद्ध, खुशहाल जीवन को साकार करने पथराई आंखों से टकटकी लगाये बैठी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम अहिंसा, आध्यात्म और उच्च संस्कारिक, संस्कृति, शिक्षा और जीवट पुरूषार्थ करने वाली पीढ़ी के उत्तराधिकारी है और समृद्धि, खुशहाली हमारी विरासत रही है।
जय स्वराज

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