सच से दूर, षड़यंत्रकारी सियासत किसी भी राष्ट्र-जन को घातक


व्ही.एस.भुल्ले
दिन-रात, अच्छा-बुरा, सृजन-विनाश, जन्म-मृत्यु का सन्तुलन और सत्य ही सृष्टि का आधार है। अब ऐसे में सच से दूर सृजन में जीवन, निर्वहन के लिए असन्तुलित सियासत की सिद्धता क्या हो, यह मौजूद लोक-गण-तंत्र में समझने वाली बात होना चाहिए। कहते है कि मानव सृष्टि की वह सर्वोत्तम कृति है जिसके सृजन का समूचा आधार ही जीव-जगत की समृद्धि, खुशहाली है। मगर दुर्भाग्य कि समूचा जीव-जगत तो आज भी अनुशासित तथा कत्र्तव्य निर्वहन के मार्ग पर सार्थक सफल कत्र्तव्य निष्ठ है। मगर मानव बौद्धिक रूप से सक्षम, समृद्ध होने के बावजूद अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में मोहताज है आखिर क्यों ? 
यह यक्ष सवाल आज भी समूचे मानव जगत के सामने है। किसी भी राष्ट्र, भू-भाग की अपनी सभ्यता, संस्कृति हो सकती है। मगर सभी का लक्ष्य एक है। समृद्ध, खुशहाल, राष्ट्र और भू-भाग जिसे तय करना हर नागरिक का कत्र्तव्य होना चाहिए और यह तभी संभव है जब हर मानव अपने-अपने कत्र्तव्यों और जबावदेहियों का निर्वहन वह जिस भी स्थिति में अपना जीवन निर्वहन करता हो। निष्ठापूर्ण ढंग से करे। तभी हम महान मानवीय सभ्यता की विरासत के उतराधिकारी कहे जायेगें। 
जय स्वराज

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