सत्ता सौपानों से गांव, गली हुआ ढैया बाहर साम्राज्यवादी ताकतों के आगे, नतमस्तक लोकतंत्र न विधान बचा सके, न ही स्वाभिमानी विधि स्वीकार सके
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
छदम लोकतंत्र में दम तोड़ती आशा-आकांक्षायें जिस तरह से साम्राज्यवादी ताकतों ने अकूत धन, प्रभावशाली बल के सहारे लोकतंत्र की आड़ में छदम लोकतंत्र के सहारे दम तोड़ रही है वह सत्ता सुख, स्वार्थवत लोगों द्वारा स्वयं का अघोषित साम्राज्य स्थापित कर सतत सत्ता सुख भोगने का माध्यम छदम लोकतंत्र को बना रखा है जो अब किसी से छिपा नहीें। जिस तरह से स्वार्थ, साम्राज्य, महत्वकांक्षी अहंकारी युग में सुन्दर भविष्य के सपने देखने वालो का हुजूम बढ़ रहा है उसे समझना होगा कि आखिर ऐसे कौन से सेवाभावी कल्याणकारी लोग है जो निर्वाचन फार्म के लिए हजारों और चुनावों में लाखों घोषित-अघोषित तौर पर खर्च कर भोले-भाले, मेहनतकस, आभावग्रस्त, स्वाभिमानी और नैसर्गिक रूप से समृद्ध लोगों की सेवा करना चाहते है। परिणाम कि जिस राष्ट्र में 50 फीसदी मातायें अल्प रक्त बच्चे कुपोषण और पशुधन अनुपयोगी धन के रूप में मौजूद हो तथा युवा, बेरोजगार, संसाधनों के मोहताज हो। ऐसे में स्वयं के खर्च पर चुनाव लड़ कुबेरपति पार्टियों, हेलीकाप्टर, हवाईजहाज, लग्झरी वाहनों में फर्राटे भरते लोग चुनाव कौन-सी सेवा कैसा कल्याण करने में सक्षम, सफल है यह विचारणीय बात है।
देखा जाये तो अंगीकार विधि में जब सभी को जीवन निर्वहन, जीने-मरने के समान अधिकार कत्र्तव्य प्राप्त है तो फिर चुनाव लड़ने की प्रक्रिया आर्थिक आभाव में समान क्यों नहीं, यहीं यक्ष सवाल मत देने से पूर्व मतदान करते वक्त हर नागरिक के ध्यान में होना चाहिए। आखिर क्यों चुनाव लड़ने कुछ धन पिपाशु साम्राज्यवादी, तथाकथित संगठन, छदम दल सत्ता तक पहुंचने से पहले सूतखोरों या पंूजीपतियों के आगे सेवा कल्याण की खातिर मोहताज हो जाते है। यहीं हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी है और भ्रष्टाचार की जड़ भी लोकतंत्र को मजबूत बनाना आज हर नागरिक का कर्म ही नहीं, धर्म होना चाहिए और यह तभी संभव है जब हम जागरूकता के साथ सारे काम छोड़ मतदान केन्द्र पर अपना मतदान इस उम्मीद के साथ करके आये कि अगले चुनाव में सत्ता में सहभागिता के लिए ऐसी चुनाव प्रक्रिया देश में इजात हो, जिसमें हर सच्चा-अच्छा नागरिक धन आभाव में सत्ता की सहभागिता से वंचित न रहे।
जय स्वराज
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