झूठ तंत्र के आगे लड़खड़ाता लोकतंत्र
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
किसी महानुभाव ने शायद सच ही लिखा था कि झूठ का गणतंत्र। ऐसी समझ के पीछे का तर्क या दर्द जो भी हो। मगर व्यक्त भावना में सच का प्रार्दुभाव होना आज के सियासी दौर में स्वभाविक है। यूं तो मसला सोशल मीडिया में फैंक न्यूज सामग्री को रोकने सूचना प्रद्योगिकी अधिनियम 2000 को सार्थक प्रभावी बनाने को लेकर है। मगर महान भू-भाग पर मौजूद लोकतंत्र, गणतंत्र को बचाने उसे मजबूत बनाने कानून बना देना ही काफी नही। अगर इतनी निष्ठा और जबावदेही के साथ कत्र्तव्यों का निर्वहन सियासत में हुआ होता तो आज छदम लोकतंत्र का जन्म ही न हुआ होता, न ही धन लालची, साम्राज्यवादी, सत्ता लोलुप ताकतों की अवैध अघोषित सन्तान के रूप में उसका अस्तित्व स्थापित होता। जिसका न तो जन, राष्ट्र, लोक, तंत्र, गण से कुछ लेना-देना है, न ही सेवा कल्याण आम जन सहित देश की समृद्धि, खुशहाली से कोई वास्ता।सच तो यह है कि फैंक न्यूज सामग्री तथा छवि सुधार तकनीक के नाम जो कत्र्तव्य सोशल मीडिया में जागा है या सोशल मीडिया में छवि चमकाऊ उद्योग भावनाओं की लूट के लिए ये तैयार हुआ है। जिसको लेकर तथाकथित मीडिया, बुद्धिजीवियों के बीच स्वयं के नैसर्गिक कत्र्तव्यों से विमुख कत्र्तव्य निष्ठा का भाव जाग्रत हुआ है। उसमें कहीं न कहीं कोई न कोई संदेह अवश्य छिपा है। आज जो लोग सोशल मीडिया में भ्रामक खबरों की चिन्ता पर अफसोस और कत्र्तव्य निष्ठा जताते नहीं थकते शायद उन्हें यह नहीं पता कि उनकी कत्र्तव्य विमुखता का परिणाम है कि चंद ताकतवर लोगों ने एक महान लोकतंत्र को छदम झूठ का तंत्र बनाकर छोड़ दिया है।
ऐसा नहीं कि धन, सत्ता लालचियों ने भोले-भाले भावुक, स्वभिमानी, मुफलिसी बेहाली का लाभ उठा उन्हें स्वार्थो के लिए विभिन्न माध्यमों से समय-समय पर प्रभावित करने का कार्य न किया हो। बल्कि राजनीति, समाज, परिवार सहित लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी प्रभावित कर स्वयं के हित में प्रभावित कर लोकतंत्र की आढ़ में छदम गणतंत्र का अघोषित तौर पर निर्माण करने का कार्य किया। जिसमें गांव, गली, गरीब का सत्ता सरकारों में भागीदारी का सेवाभावी, स्वाभिमानी निष्ठापूर्ण कत्त्र्तव्य निर्वहन का रास्ता लगभग बंदसा हो चुका है। कारण दोषपूर्ण चुनावी प्रक्रिया।
अगर वर्तमान निर्वाचन प्रक्रिया को देखे तो नामांकन आवेदन शुल्क से लेकर चुनावी खर्च का पैमाना लगभग 20 लाख के पार हो जाना और अघोषित तौर पर सामूहिक जबावदेही के चलते सैकड़ों करोड़ के पार जाना उस पर भी लग्झरी वाहन, अत्याधुनिक प्रचार के माध्यमों के रहते आम सेवाभावी, स्वाभिमानी प्रत्याशियों को इतनी सारी सुविधाओं से मेहरूम हो जाना अपने-आप में एक बड़ा सवाल है। जो गांव, गली, गरीब को सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने तथा चुनाव लड़ने सहज उपलब्ध नहीं। ऐसे में गिरोहबन्द संस्कृति में तब्दील दल, संगठन या अघोषित धन पिपासु सत्ताखोरों का शिकार होना आम प्रत्याशी के लिए स्वभाविक है। आज लोकतंत्र के महा उत्सव के दौरान इस कटु सच को समझना और अपने मत का उपयोग मतदान कर, सच्चे-अच्छे समर्पित लोगों को कर उन्हें चुनना हमारी जबावदेही ही नहीं हमारा कर्म और धर्म भी होना चाहिए। जिससे हम एक मजबूत लोकतंत्र के साथ गांव, गली, गरीब की समृद्धि, खुशहाली और सत्ता सौपानों में उनकी सहज भागीदारी सुनिश्चित कर सके।
जय स्वराज
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