कल्पना, कत्र्तव्य, विमुख व्यवस्था में सैया पर पड़ा लोकतंत्र नवसंस्कृति, शिक्षा, संस्कारों की जकड़ में सियासी तंत्र
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भारतीय लोकतंत्र में नवसंस्कृति, संस्कारों, शिक्षा के चलते जिस स्वरूप में आज सियासी तंत्र दिखाई पड़ता है उसके चलते कल्पना, कत्र्तव्य, व्यवस्था विमुख जन-तंत्र के बीच लोकतंत्र सैया पर पड़ा नजर आता है। कत्र्तव्य विमुख जबावदेही और आरोप-प्रत्यारोप के माहौल में सियासी दल जिस तरह से आर-पार के मूड़ में नजर आते है वह जन-तंत्र दोनों के लिए ही लोकतंत्र में घातक है।
मगर इससे बड़ी दुःखत और शर्मनाक बात इस महान जन-तंत्र के लिए यह है कि जिस संविधान के लिए स्वयं के विधान को त्याग उसे अंगीकार किया गया है। उसी से पोषित संवैधानिक संस्थायें और अधिकार प्राप्त जन अपने कत्र्तव्य और जबावदेही को निभाने में अक्षम, असफल साबित हो रहे है। बेहतर हो कि इस लोकतंत्र की बिना पर या तो संगठित अहंकारवाद, लोकतंत्र में स्वयं को वैचारिक या लोक कल्याणकारी संस्थायें ठहराते नहीं थकते, तो वहीं दूसरी ओर परिवारवाद के सहारे अपने वैचारिक संगठनात्मक आधार को राष्ट्र-जन में कल्याणकारी ठहराते है, जबकि हकीकत इससे इतर है।
देखा जाए तो स्वार्थ और महत्वकांक्षाओं में डूबे समर्थ, सशक्त, धन, बल, बाहुबल से समृद्ध ऐसे दल जिनके कंधों पर राष्ट्र को कभी गर्व था और वह ऐसे दल संगठनों का हिस्सा बनने पर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करते थे। अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो जिस बेरहमी से कुछ संगठन, दलों में बड़ी बेरहमी से लोकतंत्र की हत्या कर उसे एक काॅरपोरेट संस्थाओं के रूप में पोषित किया गया है वह किसी से छिपा नहीं। जिस तरह से अरबो-खरबों रूपया खर्च कर, दल, संगठन, व्यक्ति, परिवार, राष्ट्र, जनसेवा करने लग्झरी वाहन, जहाज, हेलीकाॅप्टर, मंहगे-मंहगे बार रूम, तकनीक से सुसज्जित लोगों का देश की भोली जनता को भ्रमित कर, सत्ता हथियाने के कार्यक्रम चल निकले है और जिस संस्कृति और संस्कारों पर किसी भी परिवार, समाज, राष्ट्र का आधार टिका होता है। उसके इतर पद-गरिमा को कलंकित करते लोग, न तो राष्ट्र-जन, न ही तंत्र के हित में है यह समझने वाली बात आज हर उस नागरिक को होना चाहिए जो स्वयं को भारतवासी होने पर गर्व करता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम भाग होने पर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करता है।
कहते है किसी भी राष्ट्र-जन का जीवन्त आधार ही अनुभूति का प्रमाण होता है और सही समय पर सही निर्णय उस राष्ट्र के नागरिकों की सिद्धता जिस राष्ट्र की पहचान का आधार सत्य हो और उसका अर्थ सृजन जहां कत्र्तव्य सर्वोपरि और परिणाम कल्याणकारी हो, उस समाज से सत्य के लिए स्वयं के स्वार्थ छोड़ एक समर्पित आवाज अवश्य आनी चाहिए। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आम जन के सामने सत्ता और सेवकों की समीक्षा का आधार होता है। जिसकी मतदान कर, रक्षा करना हर नागरिक का बुजुर्ग, युवा का कर्म और धर्म होना चाहिए। स्वराज न तो संस्था, संगठन, दल है, जिसका अहिंसा में पूर्ण विश्वास है। क्योंकि उसका मूल आधार सृजन और सृष्टि में अपनी सिद्धता साबित करने जबावदेही के साथ कत्र्तव्य निर्वहन उसकी पहचान है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भारतीय लोकतंत्र में नवसंस्कृति, संस्कारों, शिक्षा के चलते जिस स्वरूप में आज सियासी तंत्र दिखाई पड़ता है उसके चलते कल्पना, कत्र्तव्य, व्यवस्था विमुख जन-तंत्र के बीच लोकतंत्र सैया पर पड़ा नजर आता है। कत्र्तव्य विमुख जबावदेही और आरोप-प्रत्यारोप के माहौल में सियासी दल जिस तरह से आर-पार के मूड़ में नजर आते है वह जन-तंत्र दोनों के लिए ही लोकतंत्र में घातक है।मगर इससे बड़ी दुःखत और शर्मनाक बात इस महान जन-तंत्र के लिए यह है कि जिस संविधान के लिए स्वयं के विधान को त्याग उसे अंगीकार किया गया है। उसी से पोषित संवैधानिक संस्थायें और अधिकार प्राप्त जन अपने कत्र्तव्य और जबावदेही को निभाने में अक्षम, असफल साबित हो रहे है। बेहतर हो कि इस लोकतंत्र की बिना पर या तो संगठित अहंकारवाद, लोकतंत्र में स्वयं को वैचारिक या लोक कल्याणकारी संस्थायें ठहराते नहीं थकते, तो वहीं दूसरी ओर परिवारवाद के सहारे अपने वैचारिक संगठनात्मक आधार को राष्ट्र-जन में कल्याणकारी ठहराते है, जबकि हकीकत इससे इतर है।
देखा जाए तो स्वार्थ और महत्वकांक्षाओं में डूबे समर्थ, सशक्त, धन, बल, बाहुबल से समृद्ध ऐसे दल जिनके कंधों पर राष्ट्र को कभी गर्व था और वह ऐसे दल संगठनों का हिस्सा बनने पर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करते थे। अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो जिस बेरहमी से कुछ संगठन, दलों में बड़ी बेरहमी से लोकतंत्र की हत्या कर उसे एक काॅरपोरेट संस्थाओं के रूप में पोषित किया गया है वह किसी से छिपा नहीं। जिस तरह से अरबो-खरबों रूपया खर्च कर, दल, संगठन, व्यक्ति, परिवार, राष्ट्र, जनसेवा करने लग्झरी वाहन, जहाज, हेलीकाॅप्टर, मंहगे-मंहगे बार रूम, तकनीक से सुसज्जित लोगों का देश की भोली जनता को भ्रमित कर, सत्ता हथियाने के कार्यक्रम चल निकले है और जिस संस्कृति और संस्कारों पर किसी भी परिवार, समाज, राष्ट्र का आधार टिका होता है। उसके इतर पद-गरिमा को कलंकित करते लोग, न तो राष्ट्र-जन, न ही तंत्र के हित में है यह समझने वाली बात आज हर उस नागरिक को होना चाहिए जो स्वयं को भारतवासी होने पर गर्व करता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम भाग होने पर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करता है।
कहते है किसी भी राष्ट्र-जन का जीवन्त आधार ही अनुभूति का प्रमाण होता है और सही समय पर सही निर्णय उस राष्ट्र के नागरिकों की सिद्धता जिस राष्ट्र की पहचान का आधार सत्य हो और उसका अर्थ सृजन जहां कत्र्तव्य सर्वोपरि और परिणाम कल्याणकारी हो, उस समाज से सत्य के लिए स्वयं के स्वार्थ छोड़ एक समर्पित आवाज अवश्य आनी चाहिए। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आम जन के सामने सत्ता और सेवकों की समीक्षा का आधार होता है। जिसकी मतदान कर, रक्षा करना हर नागरिक का बुजुर्ग, युवा का कर्म और धर्म होना चाहिए। स्वराज न तो संस्था, संगठन, दल है, जिसका अहिंसा में पूर्ण विश्वास है। क्योंकि उसका मूल आधार सृजन और सृष्टि में अपनी सिद्धता साबित करने जबावदेही के साथ कत्र्तव्य निर्वहन उसकी पहचान है।
जय स्वराज
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