मतदान से पूर्व, मतदाताओं का अहम प्रश्न कि कैसे बने मजबूत लोकतंत्र
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस चुनावी प्रक्रिया के चलते आज 80 फीसद लोग सीधे सत्ता के अवसरों में भागीदारी के लिए मोहताज तथा राष्ट्र-जन सेवा को लेकर मोहताज हो। ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अवसरों को पाने का पैमाना धनबल, बाहुबल, धर्म, जाति, क्षेत्र पर आ टिका हो। ऐसे में मजबूत न्याय प्रिय निष्ठावान, निष्पक्ष लोकतंत्र की संभावना नाकाफी साबित होना स्वयं में एक सवाल है।अगर संस्थागत संवैधानिक पदों पर अवसरों का पैमाना पर मापे तो विधायिका, कार्यपालिका का कर्तव्य विधि अनुरूप निष्ठापूर्ण निर्वहन है और सत्ता हासिल करने का आधार तथाकथित तौर पर गिरोहबंद लोग, लोकतंत्र में सक्रिय हो। ऐसे सवाल होना तो लाजमी है।
मगर दुर्भाग्य कि लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र बचाने की जो सबसे बड़ी उम्मीद लोकतंत्र के चैथे स्तंभ से होती है। मगर आज जब कत्र्तव्य विमुखता के सर्वाधिक सवाल इसी स्तंभ पर है। भले ही आज धन, बल, सत्ता स्वार्थ के चलते प्रदूषण का शिकार हो। मगर जिस तरह भोले भाले भावुक मायूस बेबस लोगों के बीच सत्ता हथियाने का खेल फिलहाल 4 चरणों में होने के साथ ही अगले तीन चरण में पूर्ण होगा तथा जिसके परिणाम 23 मई को आना शेष है।
देखने वाली बात तो यह है कि इस महान भूभाग पर महान जनता, मानवता क्या निर्णय लेती है। जिस विरासत पर कभी हमें गर्व था और उसके उत्तराधिकारी होने पर हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते थे। आज अमूल्य मत से हम यह साबित करना हैं कि हम और हमारा पुरुषार्थ न तो बैवस है न ही मजबूर, न हीं हमारा विश्वास जाति, धर्म, क्षेत्र और भ्रामक प्रचार पर निर्भर है।
जय स्वराज
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