लोकतंत्र का जनादेश विविधता से भरे देश, समाज, परिवार, व्यक्तियों का आदेश
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जब अप्रत्याशित परिणामों की प्रमाणिकता जीत हार के रूप में सामने होती है। तो उनकी सार्थकता, सफलता समझ-बूझ पर सवाल होना स्वभाविक है। मगर समझ की बात तो तब है जब ऐसे परिणामों की समीक्षा निष्ठापूर्ण और ईमानदारी के साथ की जाये। इस महान भूभाग पर अप्रत्याशित परिणाम आना कोई नई बात नहीं फिर क्षेत्र जो भी रहा हो। बल्कि यह महान भूभाग ऐसे अप्रत्याशित परिणामों का हमेशा से साक्षी रहा है जिसे हम ईश्वरीय कृपा या भाग्य सहित चमत्कारिक परिणाम कहते रहे है। विविधता किसी भूभाग ही नहीं, समाज, परिवार, व्यक्तियों के अन्दर भी होती है फिर व्यवस्थायें जो भी रही हो, उनका सच भी परिणामों के रूप में साक्षी रहा है। मगर स्वयं की सफलता, सिद्धता, सार्थकता साबित करने में वहीं प्राणी मात्र सिद्ध होता है जो सजग रह, सेवा, सर्वकल्याण के मार्ग को आत्मसात कर स्वयं के पुरूषार्थ के बल स्वयं को सिद्ध करता है। ये अलग बात है कि कभी कभी सिद्धता होने से पूर्ण सार्थकता सिद्ध न हो। मगर सजग, सेवा, कल्याण और पुरूषार्थ का मार्ग बन्द नहीं होना चाहिए। यहीं सृजन में जीवन के उच्चतम मूल्य सिद्धान्त रहे है और जीवन्त इतिहास भी। देखा जाये तो मानवीय जीवन में समृद्ध, सुसंस्कृत जीवन निर्वहन में लोक नीति और अर्थ नीति का गहरा प्रभाव रहा है। जिसका मूल आधार प्रकृति और धर्म है। जिसमें जीवन निर्वहन की विभिन्न पद्धतियों और सर्व कल्याण के मार्ग सहित विभिन्न व्यवस्थाओं को जन्म दिया। आज जब लोकतंत्र का सर्वोच्चतम आधार जनादेश है। तो इसकी सहर्ष स्वीकार्यता भले ही आचरण व्यवहार साम, नाम, दण्ड, भेद के सिद्धान्त के रहते समझ को बाधित करें। मगर सत्य यहीं है और ऐसा तब होता है जब हम कहीं न कहीं, हम अपनी समझ-बूझ पुरूषार्थ और उन सिद्धान्तों की व्यवहारिकता के सच को खो देते है। जब हम उस जनमानस को समझने में असफल अक्षम सिद्ध होते है। जिनकी सेवा कल्याण के लिए हम निष्ठापूर्ण ढंग से स्वार्थवत लोगों से संघर्षरत रहते है। काश हम सजग रह स्वयं के मानवीय जीवन में स्वयं के पुरूषार्थ की सार्थकता, सिद्धता सिद्ध कर पाये, तो यहीं सबसे बड़ी समीक्षा और सिद्धता होगी।
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