उन्माद नहीं, सृजन से संभव सर्वकल्याण सत्ता के लिए, राष्ट्र सम्मान, संस्कारों का तिरस्कार घातक

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सत्ता के लिए जिस तरह का उन्माद राष्ट्र सम्मान, संस्कारों को तिलांजली दें, लोकतंत्र के महाकुंभ में अवतरित हुआ है वह भविष्य में शर्मनाक ही कहा जायेगा। क्योंकि सर्वकल्याण उन्माद से नहीं सृजन से संभव है यह बात आज सभी के लिये समझने वाली होना चाहिए। सियासत में वैचारिक मतभेद होना स्वभाविक प्रक्रिया है। मगर जब वह मन भेद में तब्दील होने आतुर हो। जिसमें राष्ट्र का मान-सम्मान स्वाभिमान, उसके संस्कार दम तोड़ने पर मजबूर हो, ऐसी सियासत कभी कल्याणकारी नहीं हो सकती। 
फैसला अन्तिम दो चरण के चुनाव में आम मतदाता को लेना होता है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है।

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