आधात्म का इतिहास गवाह है कि सिद्धता के लिए वर्ष, सदी, युग नहीं, बल्कि कुछ पल क्षण ही काफी रहे है समृद्धि में समझ, सम्मान स्वाभिमान अहम
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भारतवर्ष वह महान भूभाग है जहां विलक्षण प्रतिभायें संपदायें जिसकी कौख से समय-समय पर जन्म ले, अपना सामर्थ सिद्ध साबित करती रही है। यह 20-21वी सदी के पूर्व व भविष्य में आने वाले समय का सच है। सच यह भी है कि यह महान भूभाग संपदा, सामर्थ, प्रतिभाओं का मोहताज न तो तब था न ही अब और न ही भविष्य में रहने वाला है। मगर यह तब तक असंभव जब तक कि इस महान भूभाग की महान शिक्षा, संस्कृति पर लगे कलंक को हम नहीं मिटा लेते और जब तक हम अपने, विद्या, विद्यवान, प्रतिभाओं को सिद्ध नहीं कर लेते। यकीनन तौर पर हमें इस सत्य को स्वीकारने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हम तब भी समृद्ध, खुशहाल थे आज भी है और भविष्य में भी रहेगें। मगर इसकी सिद्धता तभी संभव है जब इस महान भूभाग पर मौजूद सत्तायें, सभासद संभायें अपनी अमूल्य संपदा, प्रतिभा, विधा, विद्ववानों को उचित सम्मान के साथ उनके स्वाभिमान की रक्षा करे।
क्योंकि विज्ञान अध्यात्म का मोहताज रहा है, न कि अध्यात्म विज्ञान का और हमारी विरासत की खूबसूरती अध्यात्म और विज्ञान का ही सम्मिश्रण है तथा हमारा सामर्थ, पुरूषार्थ उसका प्रमाण है और यह भी सत्य है कि सत्ताओं सभासदो के प्रयास और सामर्थ के अभाव में पुरूषार्थ न तो पहले किसी की मोहताज था न आज है। अगर सत्तायें, सभायें अपनी निष्ठापूर्ण सार्थकता सिद्ध करने में कामयाब हुई। तो इस महान भूभाग से सृष्टि, सृजन में सार्थकता का संदेश स्पष्ट और प्रमाण प्रमाणिकता के रूप में साफ होगा। अर्थात बगैर किसी संघर्ष के हम अपनी विरासत अनुरूप समृद्धि ही नहीं विश्व को भी संरक्षित कर मार्गदर्शित करने में सिद्ध होगें।
जय स्वराज
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