रोड, वोट मैफ के साथ, सार्थक सुपरविजन की दरकार निर्णायक क्षमता और कटु श्रवण के अभाव में अर्कमण्यता का दंश झेलता राष्ट्र भक्त संगठन
वीरेंद्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है बाढ़, तूफान, प्राकृतिक, मानव जनित आपदा पश्चात जिन लोगों की दिलचस्वी रूचि, सृजन, मानव, कल्याण में न हो। ऐसे व्यक्ति, साथी, सहयोगियों को छोड़ उनका त्याग करना ही उचित होता है और ऐसे लोगों का साथ उचित होता है। जो सारथी, सहयोगी, शुभचिन्तक बन, सृजन, सर्वकल्याण के लिए स्वयं के पुरूषार्थ की सिद्धता साबित कर, मानव जीवन की उपयोगिता सिद्ध करें।
मगर यह तभी संभव है जब नेतृत्व निर्णायक क्षमता अनुरूप निर्णय कर स्वयं की सिद्धता संगठन में साबित कर, नये कारवां को खड़ा करने देश भ्रमण करे। क्योंकि कहते है समय अनादिकाल से सृजन में तो सार्थक हुआ है। मगर निहित स्वार्थवत लोगों का सगा नहीं रहा। अब चूंकि समय आ चुका है राष्ट्र भक्त संगठन और उसके नेतृत्व को स्वयं की सिद्धता साबित करने का, ऐसे में साक्षी है। गुजरे 25 वर्ष जिनकी समीक्षा उपरांत सटीक निर्णय होना चाहिए।
समीक्षा इसलिए नहीं कि 2014 के बाद 2019 में काॅग्रेस की करारी हार हुई है। बल्कि इसलिए कि देश के 10 करोड़ मतदाताओं ने काॅग्रेस की सिद्धता में समर्थन व्यक्त किया है।
जरूरी है उस जनादेश का सम्मान जो गैर, जरूरी, सुनियोजित, स्वार्थवत गठबन्धन बन्धनों सहित ऐसे नेताओं से जो स्वयं को संगठन या काॅग्रेस से सर्वोपरि समझ गैर जरूरी व्यानबाजी कर काॅग्रेस को रसातल में पहुंचा स्वयं को स्थापित करने में कामयाब हुये है। क्योंकि जितना बुरा सत्ता के लिए 2014 से 2019 ही नहीं बल्कि विगत 25 वर्षो में हुआ है। इससे अधिक कुछ बुरा हो नहीं सकता और इसलिए ऐसे नेता, संगठनों के खिलाफ नेतृत्व को कड़े निर्णय ले, संगठन में स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि सृजन, राष्ट्र-जन कल्याण और संगठन से बड़ा कोई नहीं।
जिसके लिए रोड वोट मैफ के साथ सृजन, सर्वकल्याण में आस्था रखने वालों के साथ सीधा संवाद, संपर्क बगैर किसी संशय और औपचारिक के साथ होना चाहिए तथा सत्ताधारी दल सहित उन विद्या, विद्यवान, शुभचिन्तकों से भी सीखना चाहिए जिनकी गहरी आस्था अपने राष्ट्र-जन के सर्वकल्याण सहित सार्थक मजबूत लोकतंत्र में है और यह सब काॅरपोरेट सिस्टम कल्चर से नहीं, संस्कार, संवाद, संस्कृति से संभव है। जिसके लिए काॅग्रेस को सत्ताधारी दलों के लक्ष्य एवं तैयारियों पर शोध और स्वयं को संघर्ष के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संगठनात्मक रूप से समृद्ध, सक्षम बनाना होगा।
बाक्स
कहते हैं लोकतंत्र में आशा-आकांक्षा अनुरूप सेवा, संसाधन और संभावना विरूद्ध सिद्धता, मनुष्य को महान बनाती है।
कहते है कि सृष्टि में नैसर्गिक गुण चिर स्थाई रहते है। मगर जब यहीं नैसर्गिक गुण आचरण विरूद्ध अपनी सार्थकता सिद्ध करते है। तो उसकी सिद्धता सर्वकल्याण में स्वीकार्य होने के साथ सृजन में सहायक होती है और एक नई अनुभूति का एहसास कराती है। इतिहास गवाह है इस सृष्टि समाज में कई विभूतियों ने प्रकृति को सत्य और सृजन कल्याण को साक्षी मान स्वयं को सिद्ध किया है। जो आज भी सिद्ध है और स्वीकार्य भी जरूरत सही समझ के साथ शुरूआत की होती है। जो स्वयं की सोच के साथ सृजन, सर्वकल्याण में सामाजस्य बिठा अपने निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में सफल होते है। वह सार्थक सिद्ध भी होते है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है बाढ़, तूफान, प्राकृतिक, मानव जनित आपदा पश्चात जिन लोगों की दिलचस्वी रूचि, सृजन, मानव, कल्याण में न हो। ऐसे व्यक्ति, साथी, सहयोगियों को छोड़ उनका त्याग करना ही उचित होता है और ऐसे लोगों का साथ उचित होता है। जो सारथी, सहयोगी, शुभचिन्तक बन, सृजन, सर्वकल्याण के लिए स्वयं के पुरूषार्थ की सिद्धता साबित कर, मानव जीवन की उपयोगिता सिद्ध करें।
मगर यह तभी संभव है जब नेतृत्व निर्णायक क्षमता अनुरूप निर्णय कर स्वयं की सिद्धता संगठन में साबित कर, नये कारवां को खड़ा करने देश भ्रमण करे। क्योंकि कहते है समय अनादिकाल से सृजन में तो सार्थक हुआ है। मगर निहित स्वार्थवत लोगों का सगा नहीं रहा। अब चूंकि समय आ चुका है राष्ट्र भक्त संगठन और उसके नेतृत्व को स्वयं की सिद्धता साबित करने का, ऐसे में साक्षी है। गुजरे 25 वर्ष जिनकी समीक्षा उपरांत सटीक निर्णय होना चाहिए।
समीक्षा इसलिए नहीं कि 2014 के बाद 2019 में काॅग्रेस की करारी हार हुई है। बल्कि इसलिए कि देश के 10 करोड़ मतदाताओं ने काॅग्रेस की सिद्धता में समर्थन व्यक्त किया है।
जरूरी है उस जनादेश का सम्मान जो गैर, जरूरी, सुनियोजित, स्वार्थवत गठबन्धन बन्धनों सहित ऐसे नेताओं से जो स्वयं को संगठन या काॅग्रेस से सर्वोपरि समझ गैर जरूरी व्यानबाजी कर काॅग्रेस को रसातल में पहुंचा स्वयं को स्थापित करने में कामयाब हुये है। क्योंकि जितना बुरा सत्ता के लिए 2014 से 2019 ही नहीं बल्कि विगत 25 वर्षो में हुआ है। इससे अधिक कुछ बुरा हो नहीं सकता और इसलिए ऐसे नेता, संगठनों के खिलाफ नेतृत्व को कड़े निर्णय ले, संगठन में स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि सृजन, राष्ट्र-जन कल्याण और संगठन से बड़ा कोई नहीं।
जिसके लिए रोड वोट मैफ के साथ सृजन, सर्वकल्याण में आस्था रखने वालों के साथ सीधा संवाद, संपर्क बगैर किसी संशय और औपचारिक के साथ होना चाहिए तथा सत्ताधारी दल सहित उन विद्या, विद्यवान, शुभचिन्तकों से भी सीखना चाहिए जिनकी गहरी आस्था अपने राष्ट्र-जन के सर्वकल्याण सहित सार्थक मजबूत लोकतंत्र में है और यह सब काॅरपोरेट सिस्टम कल्चर से नहीं, संस्कार, संवाद, संस्कृति से संभव है। जिसके लिए काॅग्रेस को सत्ताधारी दलों के लक्ष्य एवं तैयारियों पर शोध और स्वयं को संघर्ष के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संगठनात्मक रूप से समृद्ध, सक्षम बनाना होगा।
बाक्स
कहते हैं लोकतंत्र में आशा-आकांक्षा अनुरूप सेवा, संसाधन और संभावना विरूद्ध सिद्धता, मनुष्य को महान बनाती है।
कहते है कि सृष्टि में नैसर्गिक गुण चिर स्थाई रहते है। मगर जब यहीं नैसर्गिक गुण आचरण विरूद्ध अपनी सार्थकता सिद्ध करते है। तो उसकी सिद्धता सर्वकल्याण में स्वीकार्य होने के साथ सृजन में सहायक होती है और एक नई अनुभूति का एहसास कराती है। इतिहास गवाह है इस सृष्टि समाज में कई विभूतियों ने प्रकृति को सत्य और सृजन कल्याण को साक्षी मान स्वयं को सिद्ध किया है। जो आज भी सिद्ध है और स्वीकार्य भी जरूरत सही समझ के साथ शुरूआत की होती है। जो स्वयं की सोच के साथ सृजन, सर्वकल्याण में सामाजस्य बिठा अपने निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में सफल होते है। वह सार्थक सिद्ध भी होते है।
जय स्वराज

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