कर्त्तव्य विमुख व्यवस्था का कलंक कलपते लोग समृद्ध राष्ट्र की विचित्र तस्वीर लजिजत नहीं, वेशर्म व्यवस्था
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वयं को समृद्ध खुशहाल बनाने संघर्षरत एक समृद्ध राष्ट्र की कर्त्तव्य विमुख व्यवस्था, लजिजत होने के बजाये इतनी बेशर्म हो तो लापरवाह विचित्र व्यवस्था का अक्स ही नहीं तस्वीर का अंदाजा लगाया जा सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति के नाम परजीवी हो चुकी हमारी कर्त्तव्य, जबाव विमुख व्यवस्था का चेहरा इतना कुरूप हो सकता है किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
आखिर हम समृद्ध, खुशहाल विरासत के उत्तराधिकारी होने के बावजूद ऐसी दुर्दशा पर कैसे गर्व मेहसूस कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर सकते हैं।जिसके संरक्षण में एक दो नहीं पूरे 100 दीपक किन्हीं परिवारों के बुझ जाए। कारण साफ है कि कर्त्तव्य जबाव विमुख व्यवस्था का स्वस्थ शिक्षा, संस्कृति के अभाव में बोलबाला, और जबावदेह लोग स्वयं के निहित स्वार्थ पूर्ति में झूठ का सहारा ले, सत्य को झुठलाने की असफल कोशिश करते हैं तो परिणाम, बैवस, बेजुबान, मायूस लोगों को सृजन त्याग के बावजूद भी अकाल काल का शिकार हो भोगना पड़ता है।
आज जब हम गांधीजी के 150 वर्ष पूर्ण होने पर नवभारत निर्माण के साथ जी.डी.पी. को 50 अरब डॉलर के स्तर पर ले जाना चाहते हैं। ऐसे में 100 बच्चों की मौत हमारे महान आध्यात्म, पुरुषार्थ, शिक्षा, संस्कृति पर कलंक है। जो हमें शर्मनाक ही नहीं दर्दनाक भी होना चाहिए जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थापित वोट और सतत सत्ता नीति का परिणाम है। अगर आज भी हम अपने राष्ट्र के विगत 30 वर्षों को भूल और वर्तमान की समीक्षा कर सृजन के मार्ग पर प्रकृति अनुकूल स्वयं को स्वास्थ्य, शिक्षा, सृजन के लिए तैयार कर पाए तो यह हम भारत वंशियों की सबसे बढ़ी उपलब्धि होगी।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वयं को समृद्ध खुशहाल बनाने संघर्षरत एक समृद्ध राष्ट्र की कर्त्तव्य विमुख व्यवस्था, लजिजत होने के बजाये इतनी बेशर्म हो तो लापरवाह विचित्र व्यवस्था का अक्स ही नहीं तस्वीर का अंदाजा लगाया जा सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति के नाम परजीवी हो चुकी हमारी कर्त्तव्य, जबाव विमुख व्यवस्था का चेहरा इतना कुरूप हो सकता है किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
आखिर हम समृद्ध, खुशहाल विरासत के उत्तराधिकारी होने के बावजूद ऐसी दुर्दशा पर कैसे गर्व मेहसूस कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर सकते हैं।जिसके संरक्षण में एक दो नहीं पूरे 100 दीपक किन्हीं परिवारों के बुझ जाए। कारण साफ है कि कर्त्तव्य जबाव विमुख व्यवस्था का स्वस्थ शिक्षा, संस्कृति के अभाव में बोलबाला, और जबावदेह लोग स्वयं के निहित स्वार्थ पूर्ति में झूठ का सहारा ले, सत्य को झुठलाने की असफल कोशिश करते हैं तो परिणाम, बैवस, बेजुबान, मायूस लोगों को सृजन त्याग के बावजूद भी अकाल काल का शिकार हो भोगना पड़ता है।
आज जब हम गांधीजी के 150 वर्ष पूर्ण होने पर नवभारत निर्माण के साथ जी.डी.पी. को 50 अरब डॉलर के स्तर पर ले जाना चाहते हैं। ऐसे में 100 बच्चों की मौत हमारे महान आध्यात्म, पुरुषार्थ, शिक्षा, संस्कृति पर कलंक है। जो हमें शर्मनाक ही नहीं दर्दनाक भी होना चाहिए जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थापित वोट और सतत सत्ता नीति का परिणाम है। अगर आज भी हम अपने राष्ट्र के विगत 30 वर्षों को भूल और वर्तमान की समीक्षा कर सृजन के मार्ग पर प्रकृति अनुकूल स्वयं को स्वास्थ्य, शिक्षा, सृजन के लिए तैयार कर पाए तो यह हम भारत वंशियों की सबसे बढ़ी उपलब्धि होगी।
जय स्वराज

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