राष्ट्र नीति पर भारी वोट नीति पर्यटन, रोजगार सामरिक दृष्टि से अहम है सवाईमाधोपुर से झांसी रेलमार्ग संसद में शेजबलकर का सवाल सटीक
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से ग्वालियर, श्योपुर छोटी रेललाइन को बड़ी रेल लाईन में बदलने में रेल विभाग झांसी सवाईमाधोपुर रेलमार्ग की अनदेखी कर तत्पर दिख रहा है वह अफसोस जनक ही नहीं शर्मनाक भी है। एक तरफ वोट नीति है तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्र नीति की दरकार जो राष्ट्र हित को सर्वोपरि मानने हमें बाध्य करती है।
यूं तो झांसी सवाईमाधोपुर को जोड़ने वाले रेलमार्ग के मुद्दे को स्वराज के मुख्य संयोजक व्ही.एस.भुल्ले विगत दो दशक से क्षेश्रीय नेताओं, मंत्रियों, तत्कालीन सरकारों के सामने लाते रहे हैं। परिणाम कि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. माधवराव सिंधिया के वक्त भी इस रेलमार्ग का सर्वे कराया गया था और जैसा कि ग्वालियर के सांसद विवेक सेलजबरकर ने लोकसभा में बताया कि 2015 में भी इस रेलमार्ग का सर्वे हुआ था। मगर रोजगार, पर्यटन सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस रेलमार्ग का न तो रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कोई संज्ञान लिया, न ही रक्षा मंत्रालय सहित पर्यटन मंत्रालय ने राष्ट्र हित के सबसे अहम मसलें पर कोई दिलचस्पी दिखाई।
देखा जाए तो सिलचर से लेकर जेसलमेर को जोड़ने वाले एन. एच.आई मार्ग की तर्ज पर लगभग 260 किलोमीटर की रेल लाईन डाल पूर्वी और पश्चिमी सीमा को सामरिक दृष्टि से मजबूत बनाया जा सकता है । इतना ही नहीं सवाईमाधोपुर झांसी रेलमार्ग के बीच पड़ने वाले तीन राष्ट्रीय उद्यान के अलावा खुजराहों से जयपुर, अजमेर और अयोध्या सहित महाकाल की नगरी पहुंचने वालों के लिए यह मार्ग अहम भूमिका निभा सकता है। अगर हम यो कहे कि इस रेलमार्ग के बनने से भारत की स्थिति पूर्वी पश्चिमी छोर पर सामरिक दृष्टि से मजबूत होगी। जहां पश्चिमी छोर पर पाकिस्तान है तो पूर्वी छोर पर चीन है। वहीं पर्यटन, रोजगार और व्यापार की दृष्टि से भी गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य सीधे जुड़ जाएंगे। देखना होगा कि देश की दोनों भुजाएं पूर्व, पश्चिम को जोड़ने वाली सवाईमाधोपुर झांसी रेलमार्ग को देश की हार्डलाइन बनाने मोदी सरकार कब कदम उठाती है। चम्बल, पार्वती, सिंध, महुअर नदियों से पटे इस क्षेत्र में 4 संसदीय क्षेत्र आते हैं।
जिस तरह से ग्वालियर, श्योपुर छोटी रेललाइन को बड़ी रेल लाईन में बदलने में रेल विभाग झांसी सवाईमाधोपुर रेलमार्ग की अनदेखी कर तत्पर दिख रहा है वह अफसोस जनक ही नहीं शर्मनाक भी है। एक तरफ वोट नीति है तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्र नीति की दरकार जो राष्ट्र हित को सर्वोपरि मानने हमें बाध्य करती है।
यूं तो झांसी सवाईमाधोपुर को जोड़ने वाले रेलमार्ग के मुद्दे को स्वराज के मुख्य संयोजक व्ही.एस.भुल्ले विगत दो दशक से क्षेश्रीय नेताओं, मंत्रियों, तत्कालीन सरकारों के सामने लाते रहे हैं। परिणाम कि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. माधवराव सिंधिया के वक्त भी इस रेलमार्ग का सर्वे कराया गया था और जैसा कि ग्वालियर के सांसद विवेक सेलजबरकर ने लोकसभा में बताया कि 2015 में भी इस रेलमार्ग का सर्वे हुआ था। मगर रोजगार, पर्यटन सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस रेलमार्ग का न तो रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कोई संज्ञान लिया, न ही रक्षा मंत्रालय सहित पर्यटन मंत्रालय ने राष्ट्र हित के सबसे अहम मसलें पर कोई दिलचस्पी दिखाई।
देखा जाए तो सिलचर से लेकर जेसलमेर को जोड़ने वाले एन. एच.आई मार्ग की तर्ज पर लगभग 260 किलोमीटर की रेल लाईन डाल पूर्वी और पश्चिमी सीमा को सामरिक दृष्टि से मजबूत बनाया जा सकता है । इतना ही नहीं सवाईमाधोपुर झांसी रेलमार्ग के बीच पड़ने वाले तीन राष्ट्रीय उद्यान के अलावा खुजराहों से जयपुर, अजमेर और अयोध्या सहित महाकाल की नगरी पहुंचने वालों के लिए यह मार्ग अहम भूमिका निभा सकता है। अगर हम यो कहे कि इस रेलमार्ग के बनने से भारत की स्थिति पूर्वी पश्चिमी छोर पर सामरिक दृष्टि से मजबूत होगी। जहां पश्चिमी छोर पर पाकिस्तान है तो पूर्वी छोर पर चीन है। वहीं पर्यटन, रोजगार और व्यापार की दृष्टि से भी गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य सीधे जुड़ जाएंगे। देखना होगा कि देश की दोनों भुजाएं पूर्व, पश्चिम को जोड़ने वाली सवाईमाधोपुर झांसी रेलमार्ग को देश की हार्डलाइन बनाने मोदी सरकार कब कदम उठाती है। चम्बल, पार्वती, सिंध, महुअर नदियों से पटे इस क्षेत्र में 4 संसदीय क्षेत्र आते हैं।

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