मैं जनसेवा में था, हूं और जीवन पर्यन्त रहूंगा- ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वयं की समीक्षा अहम

व्ही.एस.भुल्ले
आम जन के बीच सतत भ्रमण अकंल्पनीय विकास कार्यो को लाने के बाद मिली करारी हार पर काॅग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्व लोकसभा सचेतक, केन्द्रीय मंत्री, सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का खबरोंनबीसों के बीच कहना था किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। क्योंकि कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण नहीं होता। पहले मैं स्वयं फिर संगठन और फिर मेरे सेवाभाव में रही कमियों को तलाशूगां। मैं जनसेवा था, हूं और जीवन पर्यन्त जनसेवा में ही रहूंगा।
बहरहाल जन चर्चाओं, बेहतर समझ तथा स्वच्छ समृद्ध सोच रखने वालों की माने तो वह दुखित तो है और अब क्षेत्र की आवो हवा को लेकर चिन्तित भी। सवाल फिलहाल ये नहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संसदीय क्षेत्र सक्षम नेतृत्व विहीन हुआ है बल्कि सवाल यह है कि संवाद, समझ के स्तर में बड़ा बदलाव हुआ है। अब इसके पीछे के कारण कई हो सकते है। भ्रामक प्रचार, राष्ट्रवाद, जीवन्त संगठनात्मक दक्षता, संवाद, समझ की कला। आर्थिक तंगी, समृद्धि प्रबल होते हुए संगठनात्मक रूप से समाजों का रसायन शास्त्र और आम जन के बीच आचार, व्यवहार, सूचना शास्त्र। मगर जब हम नीति और सिद्धान्तों की राजनीति चाहते है और आशा-आकाक्षांओं अनुरूप जनसेवक चाहते है। तो ऐसे में राजनेताओं को भी अपने दायित्व, कत्र्तव्य निष्ठा पूर्ण स्पष्ट कर, सार्वजनिक करना चाहिए और आम जन को भी जनप्रतिनिधि की संवैधानिक सीमाऐं और दायित्व को समझना चाहिए। यह सबकुछ संपर्क, संवाद पर निर्भरता करता है।
अब हार-जीत के भविष्य भावी परिणाम जो भी हो। मगर फिलहाल तो वर्तमान माहौल में ऐसे लोगों की बांछे खिली हुई है। जो वर्षो से इस इंतजार मे थे कि कब उनको मौका मिले और वह निविघन ढंग से अपने मंसूबे पूरे कर पाये। जैसे कि आम चर्चा है कि इन लोगों का न तो जनसेवा, राष्ट्र सेवा, विकास से कोई वास्ता रहा, न ही कभी रहने वाला। जिन्होंने क्षेत्र के भोले भाले बैवस लोगों को बरगला सिर्फ स्वयं के स्वार्थ सिद्धि कर स्वयं को समृद्ध बना, स्वयं का भला किया है। कई उदाहरण सियासत के सभी के सामने है।
फिलहाल क्षेत्र के विकास, समृद्धि तथा खुशहाली के सोचने वालों की माने तो ऐसे लोगों ने न तो सियासत न ही समाज में अपने षड़यंत्रों, सियासत के चलते भले लोगों को स्थापित होने दिया न ही उन्होंने सियासत को स्वच्छ, समृद्ध रहने दिया। जिसकी आवाजें आज नहीं विगत डेढ़ दशक से आती रही है। मगर समय वेसमय उन आवाजों को  या तो अनसुना कर दिया गया या उन पर गौर नहीं हुआ। जो अवश्य ही उन लोगों के लिए समीक्षा का विषय होना चाहिए। जो स्वयं को न सही अपनी आने वाली पीढ़ी बच्चों का जीवन सुसंस्कृत, समृद्ध, खुशहाल देखना चाहते है। बरना मार्केटिंग का क्या यह तो आवश्यकतानुसार चलती रहेगी। मगर व्यवहारिक जीवन में मार्केटिंग नहीं मापदंण्डों के आधार पर जीवन समृद्ध और खुशहाल बनता है।

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