नीति का दंश झेलती नेकनियत सत्य से मुंह, छिपाती सियासत
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
फैसला जाप्ते में जनता जनार्दन का देश के सामने भले ही, इस महान देश की आशा-आकांक्षाओं का कटु सत्य हो। मगर कुछ परिणाम साक्षी है। जिन्होंने नीति के दंश के चलते नेकनियत को हताश ही नहीं निराश भी किया है। अगर हम यो कहे कि सत्य से मुंह छिपाती सियासत का नंगा सच आज की राजनीति में यहीं है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
ये अलग बात है कि कहीं न कहीं निर्दोष होने के बावजूद हमारा अक्श, सिस्टम, अहंकारी, लापरवाह और सार्गिद अहंकारी हो जाते हैं। ऐसे में आशा-आकांक्षाओं का दिगभ्रमित होना स्वभाविक है। खासकर तब की स्थिति में जब हम संकल्पित हो निष्ठापूर्ण, सेवा, कल्याण के लिए संकल्पित रहते है और सत्य के आग्रही बन स्थापित मूल्य सिद्धान्तों से समझौता न कर कत्र्तव्य निर्वहन की पराकाष्ठा करते है। मगर जब-जब हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत आचरण, व्यवहार या फिर अति विश्वास के चलते औपचारिक अनौपचारिक तौर पर कत्र्तव्य विमुख होते है। ऐसे में इंसानियत के स्वार्थवत दुश्मनों के लिए माहौल अनुकूल होता है। जो अपने स्वार्थ, झूठ अहंकार सिद्धि के लिए दिन दो दिन नहीं इन्तजार कर सफलता पाने वर्षो इन्तजार करते है। मगर आज परिणाम अप्रत्यशित है। ऐसे में कारण कई हो सकते है। मगर सत्य यही है कि जब चूक होती है तो परिणाम अप्रत्यशित ही होते है। फिर कारण जो भी हो।
कहते जो व्यक्ति सजग रह अपने पैरोकारों पर पैनी नजर नहीं रखते व आमजन से सीधा सार्थक, सम्मानजनक संवाद, सम्पर्क नहीं रखते, उसके सार्थक प्रयासों को भी निर्रथक साबित होने में देर नहीं होती। यह आज का कटु सत्य है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
फैसला जाप्ते में जनता जनार्दन का देश के सामने भले ही, इस महान देश की आशा-आकांक्षाओं का कटु सत्य हो। मगर कुछ परिणाम साक्षी है। जिन्होंने नीति के दंश के चलते नेकनियत को हताश ही नहीं निराश भी किया है। अगर हम यो कहे कि सत्य से मुंह छिपाती सियासत का नंगा सच आज की राजनीति में यहीं है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
ये अलग बात है कि कहीं न कहीं निर्दोष होने के बावजूद हमारा अक्श, सिस्टम, अहंकारी, लापरवाह और सार्गिद अहंकारी हो जाते हैं। ऐसे में आशा-आकांक्षाओं का दिगभ्रमित होना स्वभाविक है। खासकर तब की स्थिति में जब हम संकल्पित हो निष्ठापूर्ण, सेवा, कल्याण के लिए संकल्पित रहते है और सत्य के आग्रही बन स्थापित मूल्य सिद्धान्तों से समझौता न कर कत्र्तव्य निर्वहन की पराकाष्ठा करते है। मगर जब-जब हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत आचरण, व्यवहार या फिर अति विश्वास के चलते औपचारिक अनौपचारिक तौर पर कत्र्तव्य विमुख होते है। ऐसे में इंसानियत के स्वार्थवत दुश्मनों के लिए माहौल अनुकूल होता है। जो अपने स्वार्थ, झूठ अहंकार सिद्धि के लिए दिन दो दिन नहीं इन्तजार कर सफलता पाने वर्षो इन्तजार करते है। मगर आज परिणाम अप्रत्यशित है। ऐसे में कारण कई हो सकते है। मगर सत्य यही है कि जब चूक होती है तो परिणाम अप्रत्यशित ही होते है। फिर कारण जो भी हो।
कहते जो व्यक्ति सजग रह अपने पैरोकारों पर पैनी नजर नहीं रखते व आमजन से सीधा सार्थक, सम्मानजनक संवाद, सम्पर्क नहीं रखते, उसके सार्थक प्रयासों को भी निर्रथक साबित होने में देर नहीं होती। यह आज का कटु सत्य है।

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