राहुल का सामर्थ और काॅग्रेस का पुरूषार्थ सबसे अहम
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
काॅग्रेस में दूध का दूध और पानी का पानी करने पर अडिग राहुल को चाहिए कि अपने सामर्थ के बल वह यह सिद्ध करें कि वह एक सच्चे ही नहीं एक सामर्थवान राष्ट्र भक्त है। जरूरत पढ़े तो सत्ताधारी दल ही नहीं, देश भर में फैले ऐसे वैचारिक सामर्थवान लोगों से सीखने, संघर्ष के मार्ग खोजने में हिचक न करे। मगर यह तभी संभव है जब वह अपने फैसले को सिर्फ सियासी फैसला ही नहीं, बल्कि उसे एक नजीर के रूप में सिद्ध करे। क्योंकि नैतिकता, सत्य के प्रति आग्रह और सविनय अवज्ञा गांधी जी के भी वह अचूक अस्त्र रहे है। जिन्होंने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर किया। मगर आज सुखद बात यह होना चाहिए कि सत्ता पर हुकूमत किसी विदेशी की नहीं, हमारे अपने लोग है। जो अपने विचार उन्मुख राष्ट्र को समृद्ध खुशहाल बनाना चाहते है।
अगर आज जनसमर्थन उनके साथ है तो कल संघर्ष का मार्ग तथा समृद्धि, खुशहाली का विचार, संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने में काॅग्रेस सफल हुई तो यहीं जन आर्शीवाद पलटते देर न होगी। इसलिए सृजन में परोक्ष-अपरोक्ष सार्थक सहभागिता और कत्र्तव्य निर्वहन व्यक्ति, समाज, संगठनों का लोकतंत्र में मूल दायित्व होता है। यह नहीं भूलना चाहिए।
बहरहाल जो दांव हार की जिम्मेदारी के साथ राहुल ने संगठन व राष्ट्र हित में अध्यक्ष पद को त्याग खेला है उसकी सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब खुले दिल, दिमाग के साथ आम लोगों के बीच सहज सम्पर्क, संवाद का संदेश स्पष्ट हो, लोगों में अनुभूति का एहसास हो, क्योकि देश बड़ा है और काॅग्रेस भी एक बड़ा संगठन, अगर राहुल सटीक शुरूआत करने में संगठन और सियासी तौर पर सफल रहे तो कोई कारण नहीं जो काॅग्रेस की स्वीकार्यता साबित न हो सके। कहते है जिस तरह दिन-रात का चक्र सत्य है उसी प्रकार स्वीकार्यता, सहमति, असहमति, अस्वीकार्यता का चक्र भी होता है। यह तय स्वयं राहुल को करना है कि उन्हें वहीं सियासत से भरी काॅग्रेस खड़ी करना है या स्वच्छ, सृजनात्मक तथा सत्य के नजदीक संगठन।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
काॅग्रेस में दूध का दूध और पानी का पानी करने पर अडिग राहुल को चाहिए कि अपने सामर्थ के बल वह यह सिद्ध करें कि वह एक सच्चे ही नहीं एक सामर्थवान राष्ट्र भक्त है। जरूरत पढ़े तो सत्ताधारी दल ही नहीं, देश भर में फैले ऐसे वैचारिक सामर्थवान लोगों से सीखने, संघर्ष के मार्ग खोजने में हिचक न करे। मगर यह तभी संभव है जब वह अपने फैसले को सिर्फ सियासी फैसला ही नहीं, बल्कि उसे एक नजीर के रूप में सिद्ध करे। क्योंकि नैतिकता, सत्य के प्रति आग्रह और सविनय अवज्ञा गांधी जी के भी वह अचूक अस्त्र रहे है। जिन्होंने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर किया। मगर आज सुखद बात यह होना चाहिए कि सत्ता पर हुकूमत किसी विदेशी की नहीं, हमारे अपने लोग है। जो अपने विचार उन्मुख राष्ट्र को समृद्ध खुशहाल बनाना चाहते है। अगर आज जनसमर्थन उनके साथ है तो कल संघर्ष का मार्ग तथा समृद्धि, खुशहाली का विचार, संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने में काॅग्रेस सफल हुई तो यहीं जन आर्शीवाद पलटते देर न होगी। इसलिए सृजन में परोक्ष-अपरोक्ष सार्थक सहभागिता और कत्र्तव्य निर्वहन व्यक्ति, समाज, संगठनों का लोकतंत्र में मूल दायित्व होता है। यह नहीं भूलना चाहिए।
बहरहाल जो दांव हार की जिम्मेदारी के साथ राहुल ने संगठन व राष्ट्र हित में अध्यक्ष पद को त्याग खेला है उसकी सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब खुले दिल, दिमाग के साथ आम लोगों के बीच सहज सम्पर्क, संवाद का संदेश स्पष्ट हो, लोगों में अनुभूति का एहसास हो, क्योकि देश बड़ा है और काॅग्रेस भी एक बड़ा संगठन, अगर राहुल सटीक शुरूआत करने में संगठन और सियासी तौर पर सफल रहे तो कोई कारण नहीं जो काॅग्रेस की स्वीकार्यता साबित न हो सके। कहते है जिस तरह दिन-रात का चक्र सत्य है उसी प्रकार स्वीकार्यता, सहमति, असहमति, अस्वीकार्यता का चक्र भी होता है। यह तय स्वयं राहुल को करना है कि उन्हें वहीं सियासत से भरी काॅग्रेस खड़ी करना है या स्वच्छ, सृजनात्मक तथा सत्य के नजदीक संगठन।
जय स्वराज
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