अतार्किक अव्यवहारिक पैमानों के नागपास में दम तोड़ती प्रतिभा, आशा आकांक्षाएं दहशत में भविष्य

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यूं तो समर्थ, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र में प्रतिभा, संपदा, दमन दोहन की शुरुआत आजादी के लगभग 150 वर्ष पूर्व अर्थात् 1834-36 के दौरान हो चुकी थी। जब लार्ड मैकाले ने अपनी रिपोर्ट भारत भ्रमण पश्चात ब्रितानिया हुकूमत के सामने प्रस्तुत कर अनादिकाल तक भारतीयों को गुलाम बनाए रखने एक नई शिक्षा नीति की रणनीति प्रस्तुत की थी। आजादी के 70 वर्ष बाद विदवान मैकाले आज प्रमाणिक है और उसका विचार समर्थ और सिद्ध भी, अफसोस कि न तो हम हमारी महान शिक्षा, संस्कृति बचा पाए, न ही अपने संस्कारों को सुरक्षित रख स्वयं की समृद्धि को सार्थक, सर्वमान्य होने का मार्ग प्रस्त कर पाए और पैमानों के नागपाश में उलझ अपने प्रचुर संसाधन, प्रतिभाओं के दोहन दमन पर उतर समृद्ध, खुशहाल भूभाग के विनाश पर उतर आए। जिस परसेंटेज और शर्तों के साथ हम स्वयं को विधा विद्वान समझ इस महान राष्ट्र को समृद्ध खुशहाल समर्थ बनाना चाहते हैं। दरअसल यही हमारे विनाश, समस्या की जड़ है। हर व्यक्ति, परिवार, समाज, सत्ताओ के अपने छदम अहम अंहकार के आगे राष्ट्र जन सभी बैवस, बेकार है। 
दुर्भाग्य कि हम स्वयं की सत्ता के 70 वर्षों में भी ऐसा कुछ न हीं कर पाए। जो हमारा कर्तव्य था और हमारा उत्तरदायित्व भी। कर्तव्य जबावदेही विमुख माहौल में जिन्दा हम समृद्ध, खुशहाल, शिक्षा, संस्कृति भूभाग के हामी लोगों का अब यह दुर्भाग्य है या यह सौभाग्य है यह तो सभा, परिषद, समाज ही जाने मगर जब तक हम व्यवहारिक धरातल पर पुरुषार्थ करने में अक्षम, असफल होते रहेंगे तब तक समृद्ध, सामर्थ, खुशहाल राष्ट्र के सपने भी अधूरे ही रहने वाले है। फिर कितने ही तपस्वी राष्ट्र भक्तों का कृतज्ञता पूर्ण पुरुषार्थ, कर्तव्य निर्वहन के मार्ग पर प्रमाणिकता सिद्ध करने की कोशिश क्यों न कर ले।
जय स्वराज

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