सार्थक, समृद्ध, जीवन में ज्ञान अहम, विज्ञान सिर्फ जरूरत विज्ञान, निर्जीव विकास का धोतक हो सकता है सम्पूर्ण समाधान नहीं
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है हर जीव, जीवन का अपना प्राकृतिक नैसर्गिक स्वभाव, सार्थक गुण आधारित स्वीकार्य समाधान होते है। क्योंकि प्रकृति स्वतः ही समृद्ध और सत्य आधारित ज्ञान पर जीव, जीवन की समस्याओं का सम्पूर्ण समाधान है।
नई उत्तखंटाओं और उन्हें साकार रूप देने की प्रमाणिक जिद्द का नाम भी विज्ञान है वह जीव तथा जीवन की यात्रा में सार्थक, स्वीकार्य समाधान की क्षणिक धोतक तो हो सकता है। मगर खुशहाल, समृद्ध, जीव, जीवन के सार्थक परिणाम नहीं। क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न हर जीव, जीवन की अपनी अलग-अलग विशिष्टता उपायदेयता के साथ जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्याओं, संकटों का समाधान भी प्रकृति में निहित होता है। मगर अज्ञानता बस जब हमें क्षणिक समस्यायें ही पहाड़-सी दिखती है तब हम विज्ञान के रास्ते उसका क्षणिक अपूर्ण समाधान पाकर या ज्ञान प्राप्त करने की जिद्द और प्रमाणिकता के अंधकार में डूब जीव, जीवन के मूल मार्ग से भटक जाते है। जो जीव जीवन के लिए न तो सार्थक, स्वीकार्य हो पाते है, न ही वह समाधान बन पाते है और न ही अनंत प्रमाणिकता का प्रमाण।
इसलिए जीवन में विज्ञान जरूरत हो सकती है। मगर सार्थक, स्वीकार्य, समाधान नहीें। क्योंकि सम्पूर्ण सार्थक, स्वीकार्य, समाधान तो स्वयं प्रकृति और उसके ज्ञान में निहित है। जरूरत आज उसे समझने की है जिससे लोगों का ही नहीं, समूचे जीव, जगत का जीवन समर्थ, समृद्ध, खुशहाल बन सके।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है हर जीव, जीवन का अपना प्राकृतिक नैसर्गिक स्वभाव, सार्थक गुण आधारित स्वीकार्य समाधान होते है। क्योंकि प्रकृति स्वतः ही समृद्ध और सत्य आधारित ज्ञान पर जीव, जीवन की समस्याओं का सम्पूर्ण समाधान है। नई उत्तखंटाओं और उन्हें साकार रूप देने की प्रमाणिक जिद्द का नाम भी विज्ञान है वह जीव तथा जीवन की यात्रा में सार्थक, स्वीकार्य समाधान की क्षणिक धोतक तो हो सकता है। मगर खुशहाल, समृद्ध, जीव, जीवन के सार्थक परिणाम नहीं। क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न हर जीव, जीवन की अपनी अलग-अलग विशिष्टता उपायदेयता के साथ जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्याओं, संकटों का समाधान भी प्रकृति में निहित होता है। मगर अज्ञानता बस जब हमें क्षणिक समस्यायें ही पहाड़-सी दिखती है तब हम विज्ञान के रास्ते उसका क्षणिक अपूर्ण समाधान पाकर या ज्ञान प्राप्त करने की जिद्द और प्रमाणिकता के अंधकार में डूब जीव, जीवन के मूल मार्ग से भटक जाते है। जो जीव जीवन के लिए न तो सार्थक, स्वीकार्य हो पाते है, न ही वह समाधान बन पाते है और न ही अनंत प्रमाणिकता का प्रमाण।
इसलिए जीवन में विज्ञान जरूरत हो सकती है। मगर सार्थक, स्वीकार्य, समाधान नहीें। क्योंकि सम्पूर्ण सार्थक, स्वीकार्य, समाधान तो स्वयं प्रकृति और उसके ज्ञान में निहित है। जरूरत आज उसे समझने की है जिससे लोगों का ही नहीं, समूचे जीव, जगत का जीवन समर्थ, समृद्ध, खुशहाल बन सके।
जय स्वराज
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