कत्र्तव्य विमुखता की भेंट चढ़ते, महा अभियान स्वार्थवत सत्ताओं और धन पिपासुओं की चारागाह बनती आशा-आकांक्षायें

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जब भी किसी महत्वकांक्षी महा अभियान की शुरूआत या समापन होता है तो बड़े-बड़े दावे आंकड़े बाजी, उपलब्धियों के कीर्तिमान स्थापित हो जाते है। अगर कत्र्तव्य निर्वहन, जबावदेही का पैमाना यहीं है। तो स्पष्ट है कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि जिस तरह से विगत 25 वर्षो से म.प्र. में विभिन्न अभियानों का दौर चला उससे कईयो को सत्ता तो कईयों को अकूत धन मिला। मगर न तो म.प्र. के जन न ही म.प्र. को कुछ हासिल हो सका, रही सही प्राकृतिक संपदा जनधन सहित सत्ता का दोहन अवश्य बड़े पैमाने पर हुआ। फिर वह पंचायतीराज, जिला सरकार, ग्राम सम्पर्क सहित विभिन्न सम्मेलन जीर्णोउद्धार से लेकर वृक्षा रोपण, जल, तालाब बचाओं अभियान रहे हो या शौचालय से लेकर आवास और भूमि सुधार सहित किसान मजदूर कल्याण के कार्यक्रम रहे हो। कारण सार्थक विजन डी.पी.आर. सहित सर्वकल्याण की भावना के अभाव के साथ कत्र्तव्य विमुखता तथा लालसा का नंगा नाच आज भी जब ग्रीष्मकाल पश्चात जल, नदी, नाला, तालाब संरक्षण की बात हो और बारिस पश्चात वृक्षा रोपण और समय से शौचालय आवास निर्माणों के साथ, मनरेगा जैसी महत्वकांक्षी योजना उपेक्षा का शिकार ऐसे में जबावदेह कत्र्तव्य मुक्त व्यवस्था में कत्र्तव्य निर्वहन का अन्दाजा लगाया जा सकता है। सुबह से शुरू होने वाली बैठके, वीडियों काॅन्फ्रेस, जन समस्या निवारण शिविर, राजधानी, संभाग जिला स्तरीय बैठक, आय दिन नई-नई जानकारियों प्रमाण प्रमाणिकता के वह गवाह है कि आवास से लेकर वाहन लाखों हजारों के वेतन पाने वाले महानुभाव अपना कौन-सा संवैधानिक दायित्व और सरकारें किस तरह अपनी जबावदेही तय कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, शुद्ध पेयजल को कलफते लोग भले ही हैरान परेशान हो। सरकारें जिसकी भी बने बिगड़े मगर समस्याओं का अन्त फिलहाल नजर नहीं आता। 
जय स्वराज

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