आशा-आशाकांक्षाओं पर भारी महत्वकांक्षा विकास कल्याण के खाके से इतर प्राकृतिक संपदा के अंधाधुंध दोहन और अघोषित स्थानातांरण उघोग से हलाक अपेक्षायें
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भले ही म.प्र. के मुख्यमंत्री अपने वचनों को पूर्ण करने ऐड़ी चोटी का जोर लगा अल्प मत की सरकार को स्थिर रख विकास कल्याण की, बगैर रोड मैफ और स्पष्ट विजन के साकार रूप देने की कोशिश कर रहे हो। मगर जिस तरह का माहौल सरकार के 4 माह गुजर जाने के बावजूद बना हुआ है। उससे मुख्यमंत्री जी की मंशा और उनकी पार्टी के वचन पत्र का क्या परिणाम होगा यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। कहते है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते है सो हाथ कंगन को आर्सी क्या और पढ़े लिखे को फार्सी क्या, इसलिये जिस तरह से प्रशासनिक मशीनरी और सरकार अपने कत्र्तव्य निर्वहन और पुरूषार्थ की पराकाष्ठा राज्य और जनकल्याण के नाम करने में लगी है वह लगता है कि अब किसी से छिपा नहीं।
जिस मंद गति से गौसंरक्षण के लिए गौशालाओं की शुरूआत चल रही है लगता नहीं कि इतनी आसानी से प्राकृतिक संपदा से समृद्ध यह प्रदेश गौ श्राफ से मुक्त होने वाला है। क्योंकि जिनके रहमों करम पर वोटों की खातिर गौवंश की मिलकीयत उसकी संपदा को सत्ताओं ने दोनों हाथों से लुटाया उसी का परिणाम है कि आज प्रदेश का गौवंश अपना सबकुछ गवां गांव, गली भटक भूखों मरने या प्रताड़ित होने पर मजबूर है।
ये अलग बात है कि सत्ता ने जिस विजन के साथ गौशाला शुरू करने की तैयारी कर रखी है लगता नहीं कि वह आने वाले समय में प्रमाणिक परिणाम दें, इस प्रदेश को समृद्ध, खुशहाल बना सके। बहरहाल कहते है सत्ता ईश्वर का स्वरूप होती है और लोकतंत्र में सत्ता सौंपने वाली जनता स्वयं भगवान का स्वरूप। मगर कहते है कि विधान अनादिकाल से अटल रहा है और अटल रहेगा फिर इस दुनिया में आचरण व्यवहार अनुरूप इंसान रहा हो या सत्ता उसे विधान के साथ की गई दुष्टता का दंड अवश्य मिला है। हमारे वेद, धर्म, शास्त्र, किस्से-कहानी, कहावतें इस बात की गवाह है और हालिया म.प्र. में हुआ अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन भी इस बात का प्रमाण है। ऐसे में तय सत्ता, सरकार और परिषदों को करना है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भले ही म.प्र. के मुख्यमंत्री अपने वचनों को पूर्ण करने ऐड़ी चोटी का जोर लगा अल्प मत की सरकार को स्थिर रख विकास कल्याण की, बगैर रोड मैफ और स्पष्ट विजन के साकार रूप देने की कोशिश कर रहे हो। मगर जिस तरह का माहौल सरकार के 4 माह गुजर जाने के बावजूद बना हुआ है। उससे मुख्यमंत्री जी की मंशा और उनकी पार्टी के वचन पत्र का क्या परिणाम होगा यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। कहते है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते है सो हाथ कंगन को आर्सी क्या और पढ़े लिखे को फार्सी क्या, इसलिये जिस तरह से प्रशासनिक मशीनरी और सरकार अपने कत्र्तव्य निर्वहन और पुरूषार्थ की पराकाष्ठा राज्य और जनकल्याण के नाम करने में लगी है वह लगता है कि अब किसी से छिपा नहीं। जिस मंद गति से गौसंरक्षण के लिए गौशालाओं की शुरूआत चल रही है लगता नहीं कि इतनी आसानी से प्राकृतिक संपदा से समृद्ध यह प्रदेश गौ श्राफ से मुक्त होने वाला है। क्योंकि जिनके रहमों करम पर वोटों की खातिर गौवंश की मिलकीयत उसकी संपदा को सत्ताओं ने दोनों हाथों से लुटाया उसी का परिणाम है कि आज प्रदेश का गौवंश अपना सबकुछ गवां गांव, गली भटक भूखों मरने या प्रताड़ित होने पर मजबूर है।
ये अलग बात है कि सत्ता ने जिस विजन के साथ गौशाला शुरू करने की तैयारी कर रखी है लगता नहीं कि वह आने वाले समय में प्रमाणिक परिणाम दें, इस प्रदेश को समृद्ध, खुशहाल बना सके। बहरहाल कहते है सत्ता ईश्वर का स्वरूप होती है और लोकतंत्र में सत्ता सौंपने वाली जनता स्वयं भगवान का स्वरूप। मगर कहते है कि विधान अनादिकाल से अटल रहा है और अटल रहेगा फिर इस दुनिया में आचरण व्यवहार अनुरूप इंसान रहा हो या सत्ता उसे विधान के साथ की गई दुष्टता का दंड अवश्य मिला है। हमारे वेद, धर्म, शास्त्र, किस्से-कहानी, कहावतें इस बात की गवाह है और हालिया म.प्र. में हुआ अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन भी इस बात का प्रमाण है। ऐसे में तय सत्ता, सरकार और परिषदों को करना है।
जय स्वराज
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