जीवन में अराजकता रोकना अहम नैसर्गिक जीवन सार्वजनिक सम्पत्ति सेवा, सुविधाओं में बाधा और अतिक्रमण के खिलाफ बने सख्त कानून
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिन कत्र्तव्य, उत्तरदायित्वों के लिए किसी भी व्यवस्था में सरकारें, शासन, सत्तायें, स्वीकार्य सहमति से अस्तित्व में होती है। उनका मूल कत्र्तव्य, दायित्व होना चाहिए कि वह नैसर्गिक जीवन, सार्वजनिक सम्पत्ति, सेवा, सुविधाओं को संरक्षित कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें। मगर इसके उलट आज इन्हीं कत्र्तव्यों और दायित्वों से इतर सत्ता, शासन, सरकारों की विमुखता तथा व्यवस्था में बढ़ती अराजकता चिन्ता का विषय है। मौजूद व्यवस्था में बढ़ती अराजकता का मूल कारण यूं तो जबावदेही विहीन व्यवस्था और उत्तरदायित्व विहीन वह मूल्यांकन है जो अराजक, स्वार्थी लोगों को किसी भी व्यवस्था में बढ़ावा दे उन्हें जीवन में अराजकता फैलाने का घोषित-अघोषित संरक्षण देते है।
देखा जाये तो आज के समय में कुछ लोग अन्धे वैभव और धन लालसा में डूब जिस तरह से लोगों के जीवन को सेवा, सुविधाओं को सार्वजनिक सम्पत्ति पर अतिक्रमण कर लोगों के नैसर्गिक जीवन को संकट ग्रस्त बनाने से नहीं चूक रहे। ऐसे लोग की सोच और जीवन का पैमाना क्या है यह तो वहीं जाने। मगर सत्तायें कानून बना, अवश्य अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्यों का निर्वहन कर, लोगों के नैसर्गिक जीवन सार्वजनिक सम्पत्ति, सेवा सुविधाओं का संरक्षण कर, कत्र्तव्य जबावदेही सुनिश्चित कर, कानून का उल्लघन करने वालों के खिलाफ सजा व दण्ड का प्रावधान सुनिश्चित कर सकती है। क्योंकि समाज में जिस तरह से स्वयं का वैभव बढ़ाने और धन कमाने स्वार्थियों की भीड़ बढ़ रही है जो जाने अनजाने में ही सही सेवा, सुविधा सहित सार्वजनिक सम्पत्ति जैसे नदी, नाले, तालाब, नालों, वन, राजस्व, सड़क, गलियों की भूमियों पर अतिक्रमण कर व पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा उत्पन्न कर लोगों के शान्त प्रिय ज ीवन में अराजकता फैलाने से नहीं चूक रहे है तथा खादान्न जैसे पदार्थ दूध, घी, दही, मक्खन, पनीर जैसे जीवन दायनी पदार्थो में जघन्य मिलावट कर लोगों का जीवन नष्ट करने पर तुले है और जिस तरह से चंद स्वार्थी लोग नगर, शहर, गांवों को पशु पालन का अघोषित रूप से बाड़ा बनाये हुए है। ऐसे लोगों से, व्यवस्था में विश्वास रख अंगीकार करने वाले लोगों को बचाने के लिए जब तक मौजूद व्यवस्था में सख्त कानून नहीं बनेगा और कानून का उल्लघन करने वाले व्यवस्था में बैठे कत्र्तव्य विमुख लोगों को भी कानून के दायरे में ला, सजा और दण्ड का प्रावधान नहीं होगा तब तक अराजकता इसी प्रकार बढ़ती रहेगी और मानवीय जीवन ही नहीं जीव, जन्तु, पशु, पक्षी, वृक्ष-पौधे सभी का जीवन में संकट, समस्या बनी रहेगी।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिन कत्र्तव्य, उत्तरदायित्वों के लिए किसी भी व्यवस्था में सरकारें, शासन, सत्तायें, स्वीकार्य सहमति से अस्तित्व में होती है। उनका मूल कत्र्तव्य, दायित्व होना चाहिए कि वह नैसर्गिक जीवन, सार्वजनिक सम्पत्ति, सेवा, सुविधाओं को संरक्षित कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें। मगर इसके उलट आज इन्हीं कत्र्तव्यों और दायित्वों से इतर सत्ता, शासन, सरकारों की विमुखता तथा व्यवस्था में बढ़ती अराजकता चिन्ता का विषय है। मौजूद व्यवस्था में बढ़ती अराजकता का मूल कारण यूं तो जबावदेही विहीन व्यवस्था और उत्तरदायित्व विहीन वह मूल्यांकन है जो अराजक, स्वार्थी लोगों को किसी भी व्यवस्था में बढ़ावा दे उन्हें जीवन में अराजकता फैलाने का घोषित-अघोषित संरक्षण देते है। देखा जाये तो आज के समय में कुछ लोग अन्धे वैभव और धन लालसा में डूब जिस तरह से लोगों के जीवन को सेवा, सुविधाओं को सार्वजनिक सम्पत्ति पर अतिक्रमण कर लोगों के नैसर्गिक जीवन को संकट ग्रस्त बनाने से नहीं चूक रहे। ऐसे लोग की सोच और जीवन का पैमाना क्या है यह तो वहीं जाने। मगर सत्तायें कानून बना, अवश्य अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्यों का निर्वहन कर, लोगों के नैसर्गिक जीवन सार्वजनिक सम्पत्ति, सेवा सुविधाओं का संरक्षण कर, कत्र्तव्य जबावदेही सुनिश्चित कर, कानून का उल्लघन करने वालों के खिलाफ सजा व दण्ड का प्रावधान सुनिश्चित कर सकती है। क्योंकि समाज में जिस तरह से स्वयं का वैभव बढ़ाने और धन कमाने स्वार्थियों की भीड़ बढ़ रही है जो जाने अनजाने में ही सही सेवा, सुविधा सहित सार्वजनिक सम्पत्ति जैसे नदी, नाले, तालाब, नालों, वन, राजस्व, सड़क, गलियों की भूमियों पर अतिक्रमण कर व पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा उत्पन्न कर लोगों के शान्त प्रिय ज ीवन में अराजकता फैलाने से नहीं चूक रहे है तथा खादान्न जैसे पदार्थ दूध, घी, दही, मक्खन, पनीर जैसे जीवन दायनी पदार्थो में जघन्य मिलावट कर लोगों का जीवन नष्ट करने पर तुले है और जिस तरह से चंद स्वार्थी लोग नगर, शहर, गांवों को पशु पालन का अघोषित रूप से बाड़ा बनाये हुए है। ऐसे लोगों से, व्यवस्था में विश्वास रख अंगीकार करने वाले लोगों को बचाने के लिए जब तक मौजूद व्यवस्था में सख्त कानून नहीं बनेगा और कानून का उल्लघन करने वाले व्यवस्था में बैठे कत्र्तव्य विमुख लोगों को भी कानून के दायरे में ला, सजा और दण्ड का प्रावधान नहीं होगा तब तक अराजकता इसी प्रकार बढ़ती रहेगी और मानवीय जीवन ही नहीं जीव, जन्तु, पशु, पक्षी, वृक्ष-पौधे सभी का जीवन में संकट, समस्या बनी रहेगी।
जय स्वराज
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