रामराज्य में तब्दील परिवहन महकमा

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर चर्चाओं की माने तो म.प्र. सरकार का परिवहन महकमा यूं तो राजस्व मामले में नवरत्न के रूप में देखा जाता है। मगर विगत 20-25 वर्षो में सरकारों के लिए जिस तरह से यह महकमा दुधारू गाय साबित होता रहा है वह किसी से छिपा नहीं। सामान्य राजस्व बसूली से लेकर उड़नदस्ता, चैक पोस्ट जैसे माध्यमों से परिवहन महकमा राजस्व की बड़े पैमानें पर बसूली करता है। बसूली के मामले में ऐसा नहीं कि रामराज्य की कल्पना म.प्र. में नवगठित सरकार के दौरान ही कारगार साबित हो रही हो। इससे पूर्व भी कई उदाहरण ऐसे रहे है जिससे परिवहन विभाग में रामराज्य की अनुभूति होना स्वभाविक है। 
अगर चर्चाओं की माने तो पात्रता के विरूद्ध चैक पोस्टों पर अमले की पदस्थापना भी म.प्र. में कोई नई बात नहींे। मगर जो रिकार्ड औपचारिक, अनौपचारिक घोषित-अघोषित तौर पर म.प्र. परिवहन में देखने-सुनने में आ रहा है वह काबिले गौर है। कारण उपनिरीक्षक, निरीक्षक लेवल के चैक पोस्टों पर सिपाही, हवलदारों के प्रभार परिवहन महकमें में रामराज्य को समझने काफी है। ये अलग बात है कि परिवहन महकमें के मुखिया जहां पूर्व सरकार में सरकार के लाडले बने रहे तो वर्तमान सरकार में भी उनकी पैठ कुछ कम नहीं। विभाग का आलम यह है कि मुखिया से लेकर उनके पीए तक से दूरभाष या मोबाईल पर संपर्क करना आम नागरिक ही नहीं किसी मीडियाकर्मी को भी संभव नहीं। कहते है समरथ को नहीं दोष गंुसाई।

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