नागरिक सुरक्षा से खिलबाड़, सत्ता व सरकारों के लिए शर्मनाक
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से आज सुरक्षा व्यवस्था संसाधन और आपराधिक संस्कृति से जूझ रही है वह किसी भी सभ्य व्यवस्था के लिए गौरव की बात नहीं हो सकती। बल्कि किसी भी व्यवस्था में नागरिकों की सुरक्षा उसका सबसे बड़ा कत्र्तव्य होता है। वोट नीति के चलते सत्तायें, सभा, परिषदें, सेवा, कल्याण के जुनून में इस कदर डूब चुकी है कि उन्हें यह इल्म ही नहीं कि वह मौजूद अपने नागरिकों और वोटरों को जाने-अनजाने में इस अराजकता के अन्धे कुऐं धकेलने पर मजबूर है।
भीड़ की हिंसा और भीड़ का पुलिस और प्रशासन पर बढ़ता नैतिक अनैतिक दबाव इस बात का प्रमाण है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था जर्ज-जर्ज हो अपने कत्र्तव्यों से मुक्त होने पर मजबूर है। जिस तरह से आये दिन सुरक्षा कर्मियों और अधिकारियों को नैतिक-अनैतिक प्रदर्शनों भीड़ की हिंसा के सामने मान मनोहर कर स्थिति को सम्हालना पड़ता है यह आज की सत्ता, सभा, परिषदें और सरकारों के लिए शर्मनाक बात होनी चाहिए। राज व्यवस्था जो भी हो उसका मूल आधार ही आम नागरिक की सुरक्षा और सेवा से जुड़ा होता है। मगर सुनियोजित तरीके से सुरक्षा को छोड़ सत्ता के लिए सेवा कल्याणों का डिंढोरा पीटा जा रहा है वह न तो लोकतांत्रिक व्यवस्था और न ही इस व्यवस्था में विश्वास रखने वाले समाज, परिवार, नागरिकों के लिए सार्थक है।
बेहतर हो कि आम नागरिक की सुरक्षा की समीक्षा के साथ सुरक्षा कर्मियों की संख्या एवं संसाधनों की उपलब्धता पर सरकारें ध्यान दें, बरना भीड़ की अराजकता इस महान लोकतांत्रिक व्यवस्था को कहीं का न छोड़े तो अति संयोक्ति न होगी।
जिस तरह से आज सुरक्षा व्यवस्था संसाधन और आपराधिक संस्कृति से जूझ रही है वह किसी भी सभ्य व्यवस्था के लिए गौरव की बात नहीं हो सकती। बल्कि किसी भी व्यवस्था में नागरिकों की सुरक्षा उसका सबसे बड़ा कत्र्तव्य होता है। वोट नीति के चलते सत्तायें, सभा, परिषदें, सेवा, कल्याण के जुनून में इस कदर डूब चुकी है कि उन्हें यह इल्म ही नहीं कि वह मौजूद अपने नागरिकों और वोटरों को जाने-अनजाने में इस अराजकता के अन्धे कुऐं धकेलने पर मजबूर है।
भीड़ की हिंसा और भीड़ का पुलिस और प्रशासन पर बढ़ता नैतिक अनैतिक दबाव इस बात का प्रमाण है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था जर्ज-जर्ज हो अपने कत्र्तव्यों से मुक्त होने पर मजबूर है। जिस तरह से आये दिन सुरक्षा कर्मियों और अधिकारियों को नैतिक-अनैतिक प्रदर्शनों भीड़ की हिंसा के सामने मान मनोहर कर स्थिति को सम्हालना पड़ता है यह आज की सत्ता, सभा, परिषदें और सरकारों के लिए शर्मनाक बात होनी चाहिए। राज व्यवस्था जो भी हो उसका मूल आधार ही आम नागरिक की सुरक्षा और सेवा से जुड़ा होता है। मगर सुनियोजित तरीके से सुरक्षा को छोड़ सत्ता के लिए सेवा कल्याणों का डिंढोरा पीटा जा रहा है वह न तो लोकतांत्रिक व्यवस्था और न ही इस व्यवस्था में विश्वास रखने वाले समाज, परिवार, नागरिकों के लिए सार्थक है।
बेहतर हो कि आम नागरिक की सुरक्षा की समीक्षा के साथ सुरक्षा कर्मियों की संख्या एवं संसाधनों की उपलब्धता पर सरकारें ध्यान दें, बरना भीड़ की अराजकता इस महान लोकतांत्रिक व्यवस्था को कहीं का न छोड़े तो अति संयोक्ति न होगी।

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