बैठकों ने बैठाला, म.प्र. का भट्टा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सेवा कल्याण सुरक्षा के नाम अस्तित्व में आई अल्प मत काॅग्रेस की सरकार से यूं तो आम मतदाता को बड़ी उम्मीद थी। मगर जिस तरह से धना-धन स्थानातांरणों का दौर शुरू हो, बैठकों का दौर प्रदेश भर में शुरू हुआ है वह बड़ा ही खतरनाक है। म.प्र. की राजधानी से लेकर संभाग, जिला स्तर से लेकर अनुविभाग स्तर पर होने वाली बैठकों के परिणाम क्या है यह तो सरकार ही जाने।
मगर जिस तरह से भीड़ में मौजूद अधिकारी कभी पीसी वीडियों काॅन्फ्रेन्स तो कभी टीएल तो कभी अन्य बैठकों के अलावा दिन भर जानकारियों के संग्लन में डूब कौन-सा विकास, कल्याण सेवा करना चाहते है यह भी सरकार जाने। मगर मोटी बात यह है कि जो अधिकारी हर महीने बैठक समीक्षा के नाम अपना मूल कार्य छोड़ बैठकों में डूबे रहते है उससे लगता नहीं कि आम नागरिक का कुछ खास भला होने वाला है। मगर सरकार है कि उसे फुर्सरत कहां। जो लाखों के वेतन, लग्झरी वाहन आॅफिसों की सुविधा उठाने वालों से यह सवाल कर सके कि प्रमाणिक परिणाम क्या है फिलहाल तो कत्र्तव्य विमुखता की बाढ़ ने आम आशा-आकांक्षायें कलफने पर मजबूर है। देखना होगा कि जिला सरकार को मूर्तरूप देने में जुटी सरकार कत्र्तव्य विमुख होते अपने मातहतों से कितना कुछ राज्य व जनहित में करा पाती है।
सेवा कल्याण सुरक्षा के नाम अस्तित्व में आई अल्प मत काॅग्रेस की सरकार से यूं तो आम मतदाता को बड़ी उम्मीद थी। मगर जिस तरह से धना-धन स्थानातांरणों का दौर शुरू हो, बैठकों का दौर प्रदेश भर में शुरू हुआ है वह बड़ा ही खतरनाक है। म.प्र. की राजधानी से लेकर संभाग, जिला स्तर से लेकर अनुविभाग स्तर पर होने वाली बैठकों के परिणाम क्या है यह तो सरकार ही जाने।मगर जिस तरह से भीड़ में मौजूद अधिकारी कभी पीसी वीडियों काॅन्फ्रेन्स तो कभी टीएल तो कभी अन्य बैठकों के अलावा दिन भर जानकारियों के संग्लन में डूब कौन-सा विकास, कल्याण सेवा करना चाहते है यह भी सरकार जाने। मगर मोटी बात यह है कि जो अधिकारी हर महीने बैठक समीक्षा के नाम अपना मूल कार्य छोड़ बैठकों में डूबे रहते है उससे लगता नहीं कि आम नागरिक का कुछ खास भला होने वाला है। मगर सरकार है कि उसे फुर्सरत कहां। जो लाखों के वेतन, लग्झरी वाहन आॅफिसों की सुविधा उठाने वालों से यह सवाल कर सके कि प्रमाणिक परिणाम क्या है फिलहाल तो कत्र्तव्य विमुखता की बाढ़ ने आम आशा-आकांक्षायें कलफने पर मजबूर है। देखना होगा कि जिला सरकार को मूर्तरूप देने में जुटी सरकार कत्र्तव्य विमुख होते अपने मातहतों से कितना कुछ राज्य व जनहित में करा पाती है।
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