अघोषित माफियाराज की धमक से थर्राता लोकतंत्र

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
भले ही हमारी मौजूद व्यवस्था, सत्ता, परिषदें, अपने-अपने व्यवस्थागत अधिकारों के चलते सेवा, कल्याण के दावे प्रति दावे कितने ही क्यों न करे और उसकी बिना पर हार-जीत के खेल भी खूब चलते रहे। मगर उस कटु सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जिसका दंश झेल गांव, गली के गरीब, बैवस, मायूस लोग अपने-अपने मान-सम्मान, स्वाभिमान को तिलांजली दें, व्यवस्था में पनपते अघोषित माफियाराज में जीवन जीने को मजबूर है। लगभग व्यवस्थागत मौजूद सेवा, सुविधा और कल्याण के क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा अहम क्षेत्र बचा हो, जो अघोषित माफियाराज से अछूता हो। धन लालची, धन पिपासु इन्सानियत के दुश्मनों का यह अदृश्य गठजोड़ भले ही दिखाई न देता हो। मगर इसके क्रूर कृतज्ञता से समूची व्यवस्था ही नहीं आम जीव, जगत भी कराहने पर मजबूर है। फिर वह क्षेत्र सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा सुविधा, दवा, पेयजल, खाद्य, भूभाग या फिर अवैध बसूली करने वाले माफियाओं से क्यों न जुड़ा हो। मगर एक भी कृतज्ञ व्यवस्थागत अंश इस अघोषित माफिया से सेवा कल्याण के नाम संघर्ष करता दिखाई नहीं देता। 
परिणाम सामने है मगर व्यवस्थागत अधिकारों से पुरूस्कृत कृतज्ञता के परिणाम क्या है यह आज हम सभी को समझने वाली बात होनी चाहिए। 

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