आन्तरिक सुरक्षा पर अनुत्तरित सवाल संसाधन, संख्याबल और क्षमता को लेकर सांसत में राज्य
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है अगर आगाज अच्छा हो तो सुनहरे भविष्य की सम्भावनाऐं स्वतः बलबती हो जाती है। जिस तरह से सदन में पूछे गए सवालों का जबाव देते वक्त देश के गृहमंत्री ने पूरी दृढ़ता के साथ सरकार के सामर्थ और राष्ट्र-जन की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है वह देश वासियों को काबिले गौर होना चाहिए।
पुलिस सुधार से लेकर जघन्य अपराध तथा भीड़ की हिंसा पर उठते सवाल कोई अन्यास ही नहीं। ये अलग बात है कि आज कानून, समाज व लोगों के बीच समरस्ता सौहार्द पूर्ण माहौल बनाने में असफल रहा है तथा सामाजिक मान्यताऐं भी कानून की धज्जियां उड़ाने वालों के आगे असमर्थ है। ऐसे में कानून की धज्जियां उड़ा लोगों में डर का भाव पैदा करने वालों के हौसले बढ़ना स्वभाविक है। ऐसी स्थिति में जब देश की बाह सुरक्षा को चाक-चैबन्द किया जा रहा है। ऐसे में आन्तरिक सुरक्षा के मद्देनजर सवाल उठना स्वभाविक है। देखा जाये तो यह मसला सिर्फ अकेले केन्द्र सरकार का नहीं है बल्कि सीधे तौर पर राज्य सरकारों से भी जुड़ा है। अगर कुछ केन्द्र शासित प्रदेशों को छोड़ दें, तो अधिकांश राज्यों में कानून व्यवस्था और नागरिकों की आन्तरिक सुरक्षा राज्यों से जुड़ा होता है। मगर जिस तरह से संसाधन, संख्याबल के आधार पर कई राज्यों में सुरक्षा का आभाव महसूस होता है और जिसका सीधा लाभ उठा भीड़ पुलिस व प्रशासन को मजबूर कर कानून हाथ में ले, सरकार, सत्ता, समाजों को नीचा दिखाती है तथा अपराधी मनमानी कर, खुलेयाम घूमते है, यह किसी से छिपा नहीं। ऐसे में सत्ताओं को अपने सियासी सरोकारों के साथ आम नागरिक की सुरक्षा को भी सरोकारों के मध्य में रखना चाहिए। क्योंकि हर नागरिक की पहली आवश्यकता किसी भी सभ्य, समृद्ध, समाज में उसकी सुरक्षा और कानून का राज होता है। जिससे वह निर्भीक होकर अपना स्वच्छन्द जीवन निर्वहन कर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सके। जिस तरह से आज अमूमन सड़क या थाना चैकियों में पुलिस बल समय आने पर कम दिखाई देता है तथा मौका पड़ने पर संसाधन विहीन बल स्वयं को कत्र्तव्य निर्वहन में अक्षम पाता है यह सत्ता, सरकारों के लिए राष्ट्र-जन हित में समझने वाली बात होना चाहिए। आज जिस तरह की फिजीकल, सोशल, प्रोफेशनल प्रशिक्षण और अत्याधुनिक संसाधनों की जरूरत पुलिस को है वह दूर-दूर तक नजर नहीं आता। बेहतर हो देश के गृहमंत्री को राज्यों में विकराल होती इस समस्या का समाधान खोज आन्तरिक सुरक्षा को भी चाक-चैबन्द करना चाहिए। क्योंकि बाह-सुरक्षा को चाक-चैबन्द करने का प्रधानमंत्री का सामर्थ देश वासियों से छिपा नहीं है। अगर बाह-सुरक्षा के साथ आन्तरिक सुरक्षा भी मजबूत होती है तो यह नवभारत निर्माण में दूर की कोणी साबित होगी, जो संभव भी है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है अगर आगाज अच्छा हो तो सुनहरे भविष्य की सम्भावनाऐं स्वतः बलबती हो जाती है। जिस तरह से सदन में पूछे गए सवालों का जबाव देते वक्त देश के गृहमंत्री ने पूरी दृढ़ता के साथ सरकार के सामर्थ और राष्ट्र-जन की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है वह देश वासियों को काबिले गौर होना चाहिए।
पुलिस सुधार से लेकर जघन्य अपराध तथा भीड़ की हिंसा पर उठते सवाल कोई अन्यास ही नहीं। ये अलग बात है कि आज कानून, समाज व लोगों के बीच समरस्ता सौहार्द पूर्ण माहौल बनाने में असफल रहा है तथा सामाजिक मान्यताऐं भी कानून की धज्जियां उड़ाने वालों के आगे असमर्थ है। ऐसे में कानून की धज्जियां उड़ा लोगों में डर का भाव पैदा करने वालों के हौसले बढ़ना स्वभाविक है। ऐसी स्थिति में जब देश की बाह सुरक्षा को चाक-चैबन्द किया जा रहा है। ऐसे में आन्तरिक सुरक्षा के मद्देनजर सवाल उठना स्वभाविक है। देखा जाये तो यह मसला सिर्फ अकेले केन्द्र सरकार का नहीं है बल्कि सीधे तौर पर राज्य सरकारों से भी जुड़ा है। अगर कुछ केन्द्र शासित प्रदेशों को छोड़ दें, तो अधिकांश राज्यों में कानून व्यवस्था और नागरिकों की आन्तरिक सुरक्षा राज्यों से जुड़ा होता है। मगर जिस तरह से संसाधन, संख्याबल के आधार पर कई राज्यों में सुरक्षा का आभाव महसूस होता है और जिसका सीधा लाभ उठा भीड़ पुलिस व प्रशासन को मजबूर कर कानून हाथ में ले, सरकार, सत्ता, समाजों को नीचा दिखाती है तथा अपराधी मनमानी कर, खुलेयाम घूमते है, यह किसी से छिपा नहीं। ऐसे में सत्ताओं को अपने सियासी सरोकारों के साथ आम नागरिक की सुरक्षा को भी सरोकारों के मध्य में रखना चाहिए। क्योंकि हर नागरिक की पहली आवश्यकता किसी भी सभ्य, समृद्ध, समाज में उसकी सुरक्षा और कानून का राज होता है। जिससे वह निर्भीक होकर अपना स्वच्छन्द जीवन निर्वहन कर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सके। जिस तरह से आज अमूमन सड़क या थाना चैकियों में पुलिस बल समय आने पर कम दिखाई देता है तथा मौका पड़ने पर संसाधन विहीन बल स्वयं को कत्र्तव्य निर्वहन में अक्षम पाता है यह सत्ता, सरकारों के लिए राष्ट्र-जन हित में समझने वाली बात होना चाहिए। आज जिस तरह की फिजीकल, सोशल, प्रोफेशनल प्रशिक्षण और अत्याधुनिक संसाधनों की जरूरत पुलिस को है वह दूर-दूर तक नजर नहीं आता। बेहतर हो देश के गृहमंत्री को राज्यों में विकराल होती इस समस्या का समाधान खोज आन्तरिक सुरक्षा को भी चाक-चैबन्द करना चाहिए। क्योंकि बाह-सुरक्षा को चाक-चैबन्द करने का प्रधानमंत्री का सामर्थ देश वासियों से छिपा नहीं है। अगर बाह-सुरक्षा के साथ आन्तरिक सुरक्षा भी मजबूत होती है तो यह नवभारत निर्माण में दूर की कोणी साबित होगी, जो संभव भी है।

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