वोट नीत और बेवजह के अभियानों ने बैठाला, भट्टा राष्ट्र भक्तों का मान-सम्मान अहम पुरूषार्थ की पराकाष्ठा, आध्यात्म-तकनीक हमारी विरासत
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वार्थ, ज्ञान, विज्ञान की चकाचैंध में लोग देश-विदेश हमें जो भी नाम दें तथा हमारी पहचान और प्रमाणिकता का पैमाना जो भी हो तथा हमारे अपने कत्र्तव्य, जबावदेही का निर्धारण जैसा भी रहा हो। मगर आजादी के 70 वर्ष पश्चात भी कुछ सवाल आज भी यक्ष है। जो नैतिकता, संस्कृति, संस्कार सहित सत्ताओं, परिषद पर सवाल खड़े करने काफी है। आखिर हमारे लिए हमारे द्वारा या हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित व्यवस्था हम लोगों के प्रति इतनी कत्र्तव्य विमुख बेहरहम कैसे हो सकती है। कैसे हम अपना पुरूषार्थ, त्याग, तपस्या की ही अनदेखी कर सकती है।
जिस व्यवस्था में जन्म से लेकर मृत्यु तक के पुरूषार्थ का पैमाना निर्धारित हो वह कैसे पहचान के मोहताज बन गये यह हमारे लिए दर्दनाक भी है शर्मनाक भी। आखिर वह समाज, संस्कृति हमारे बीच से कहां काफुर हो गई, जिस पर हमें गर्व था। आज वक्त है ऐसे पुरूषार्थ शख्यितों को सम्मानित करने का या फिर आज वह हमारे बीच हो या न हो, अगर आने वाली या मौजूद हमारी पीढ़ी और मौजूद व्यवस्था आज भी इस सच से अनभिज्ञ रही तो यह हमारी सबसे बड़ी अक्षमता असफलता ही नहीं नाकामी होगी। जो न तो कभी हमारी पहचान रही और न ही हमारी विरासत इसलिये वोट नीत और बेवजह के अभियानों से इतर हम अपनी प्रतिभा, विधा, विद्ववानों का सम्मान कर, अपने पुरूषार्थ की प्रमाणिकता सिद्ध करें यहीं हर राष्ट्र भक्त को समझने वाली बात होनी चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वार्थ, ज्ञान, विज्ञान की चकाचैंध में लोग देश-विदेश हमें जो भी नाम दें तथा हमारी पहचान और प्रमाणिकता का पैमाना जो भी हो तथा हमारे अपने कत्र्तव्य, जबावदेही का निर्धारण जैसा भी रहा हो। मगर आजादी के 70 वर्ष पश्चात भी कुछ सवाल आज भी यक्ष है। जो नैतिकता, संस्कृति, संस्कार सहित सत्ताओं, परिषद पर सवाल खड़े करने काफी है। आखिर हमारे लिए हमारे द्वारा या हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित व्यवस्था हम लोगों के प्रति इतनी कत्र्तव्य विमुख बेहरहम कैसे हो सकती है। कैसे हम अपना पुरूषार्थ, त्याग, तपस्या की ही अनदेखी कर सकती है। जिस व्यवस्था में जन्म से लेकर मृत्यु तक के पुरूषार्थ का पैमाना निर्धारित हो वह कैसे पहचान के मोहताज बन गये यह हमारे लिए दर्दनाक भी है शर्मनाक भी। आखिर वह समाज, संस्कृति हमारे बीच से कहां काफुर हो गई, जिस पर हमें गर्व था। आज वक्त है ऐसे पुरूषार्थ शख्यितों को सम्मानित करने का या फिर आज वह हमारे बीच हो या न हो, अगर आने वाली या मौजूद हमारी पीढ़ी और मौजूद व्यवस्था आज भी इस सच से अनभिज्ञ रही तो यह हमारी सबसे बड़ी अक्षमता असफलता ही नहीं नाकामी होगी। जो न तो कभी हमारी पहचान रही और न ही हमारी विरासत इसलिये वोट नीत और बेवजह के अभियानों से इतर हम अपनी प्रतिभा, विधा, विद्ववानों का सम्मान कर, अपने पुरूषार्थ की प्रमाणिकता सिद्ध करें यहीं हर राष्ट्र भक्त को समझने वाली बात होनी चाहिए।
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