कृष्णधाम के जीर्णोउद्धार से संभव है समृद्धि, खुशहाली बांकेबिहारी वृन्दावन, द्वारकाधीश मथुरा के लिए बने पायलेट प्रोजक्ट समृद्ध, संस्कृति ही सार्थी हो सकती है समृद्ध राष्ट्र की
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र की समृद्धि, खुशहाली में एक समृद्ध, संस्कृति का बड़ा योगदान होता है। सौभाग्यशाली है इस महान भूभाग के वह लोग जिनकी विरासत ही समृद्ध, संस्कृति रही है। आज जब पुर्न निर्माण समृद्धि, खुशहाली की बात होती है तब हमें हमारी महान संस्कृति की याद आना स्वभाविक है और इस महान संस्कृति को आत्मसात करने समझने जरूरी है कि बांकेबिहारी वृन्दावन, द्वारकाधीश मथुरा को पायलेट प्रोजक्ट के तहत एक ऐसे प्रतीक के रूप में स्थापित करने की शुरूआत होना चाहिए जिससे हमारी मौजूद नस्ल और आने वाली पीढ़ी हमारी महान संस्कृति से रूबवा-रूह हो परिचित हो सके। जरूरत आज इस बात की है कि हमारी सरकारें, सत्ता, परिषदें इस अहम सवाल पर गंभीरता से विचार कर अविलम्ब एक खुशहाल समृद्ध, संस्कृति के जीर्णोउद्धार की शुरूआत करे। क्योंकि जितना सैद्धान्तिक सच उसकी स्वीकार्यता, अनुभूति, एहसास का भान हम अपनी इस समृद्ध विरासत से बच्चे, युवा, बुजुर्ग और आने वाली पीढ़ी को करा सकते है। इससे बेहतर और कोई माध्यम, तकनीक इस महान राष्ट्र नहीं हो सकती और यह संभव है। जिसका लक्ष्य और परिणाम भी वर्ष दो वर्ष में प्राप्त किये जा सकते है।
क्योंकि बढ़ती जनसंख्या अल्प रोजगार और संस्कार, संस्कृति से बढ़ती विमुखता को रोकने मौजूद शिक्षा प्रणाली उतनी दुरूस्त नहीं, जो हमारी समृद्धि, खुशहाली की सहभागिनी बन आम जीवन को समृद्ध, खुशहाल बना सके। कहते है शिक्षा का महत्व और शिक्षा का अर्थ समझने लोगों को प्लेटो का शिक्षा, सिद्धान्त अवश्य पढ़ना चाहिए। जिसका भाव यह समझने काफी है कि शिक्षा के मायने सिर्फ किताबें पढ़ना, अंकों के लिए संघर्ष करना ही नहीं, शिक्षा का मतलब व्यक्ति के समृद्ध, खुशहाल सुरक्षित जीवन का निर्माण करना है और यह कृष्ण जीवन से जुड़े कई पहलू एवं हिन्दू धर्म ग्रंथ के महा काव्य भागवत, गीता से सीखने से और कोई बेहतर तरीका नहीं हो सकता। कहते है कि दृश्य, अक्षर और अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ लोगों को सीखने का बेहतर माध्यम होता है। अगर हम कृष्णधाम के जीर्णोउद्धार के साथ उसकी महत्वता और उस संस्कृति से जुड़े सत्य को पुर्न स्थापित करने में सिद्ध, सफल हुए तो कोई कारण नहीं कि हमारी बढ़ती आबादी की उपायदेयता और मानव जीव, जगत की समृद्धि, खुशहाली पाने में हम सिद्ध न हो सके।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र की समृद्धि, खुशहाली में एक समृद्ध, संस्कृति का बड़ा योगदान होता है। सौभाग्यशाली है इस महान भूभाग के वह लोग जिनकी विरासत ही समृद्ध, संस्कृति रही है। आज जब पुर्न निर्माण समृद्धि, खुशहाली की बात होती है तब हमें हमारी महान संस्कृति की याद आना स्वभाविक है और इस महान संस्कृति को आत्मसात करने समझने जरूरी है कि बांकेबिहारी वृन्दावन, द्वारकाधीश मथुरा को पायलेट प्रोजक्ट के तहत एक ऐसे प्रतीक के रूप में स्थापित करने की शुरूआत होना चाहिए जिससे हमारी मौजूद नस्ल और आने वाली पीढ़ी हमारी महान संस्कृति से रूबवा-रूह हो परिचित हो सके। जरूरत आज इस बात की है कि हमारी सरकारें, सत्ता, परिषदें इस अहम सवाल पर गंभीरता से विचार कर अविलम्ब एक खुशहाल समृद्ध, संस्कृति के जीर्णोउद्धार की शुरूआत करे। क्योंकि जितना सैद्धान्तिक सच उसकी स्वीकार्यता, अनुभूति, एहसास का भान हम अपनी इस समृद्ध विरासत से बच्चे, युवा, बुजुर्ग और आने वाली पीढ़ी को करा सकते है। इससे बेहतर और कोई माध्यम, तकनीक इस महान राष्ट्र नहीं हो सकती और यह संभव है। जिसका लक्ष्य और परिणाम भी वर्ष दो वर्ष में प्राप्त किये जा सकते है। क्योंकि बढ़ती जनसंख्या अल्प रोजगार और संस्कार, संस्कृति से बढ़ती विमुखता को रोकने मौजूद शिक्षा प्रणाली उतनी दुरूस्त नहीं, जो हमारी समृद्धि, खुशहाली की सहभागिनी बन आम जीवन को समृद्ध, खुशहाल बना सके। कहते है शिक्षा का महत्व और शिक्षा का अर्थ समझने लोगों को प्लेटो का शिक्षा, सिद्धान्त अवश्य पढ़ना चाहिए। जिसका भाव यह समझने काफी है कि शिक्षा के मायने सिर्फ किताबें पढ़ना, अंकों के लिए संघर्ष करना ही नहीं, शिक्षा का मतलब व्यक्ति के समृद्ध, खुशहाल सुरक्षित जीवन का निर्माण करना है और यह कृष्ण जीवन से जुड़े कई पहलू एवं हिन्दू धर्म ग्रंथ के महा काव्य भागवत, गीता से सीखने से और कोई बेहतर तरीका नहीं हो सकता। कहते है कि दृश्य, अक्षर और अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ लोगों को सीखने का बेहतर माध्यम होता है। अगर हम कृष्णधाम के जीर्णोउद्धार के साथ उसकी महत्वता और उस संस्कृति से जुड़े सत्य को पुर्न स्थापित करने में सिद्ध, सफल हुए तो कोई कारण नहीं कि हमारी बढ़ती आबादी की उपायदेयता और मानव जीव, जगत की समृद्धि, खुशहाली पाने में हम सिद्ध न हो सके।
जय स्वराज
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