भारत की समृद्धि में कृष्णधाम का जीर्णोउद्धार अहम
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर समुची संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों का निष्ठापूर्ण सार्थक अध्ययन पश्चात उनकी सटीक व्याख्या हो तो सत्य समझने में कोई संशय न होगा और सत्य शायद आज की स्थिति में यहीं है। जिसे हम कृष्ण के नाम से जानते है पहचानते है। जिसमें समृद्धि का मार्ग स्वतः ही निहित है और इस महान भूभाग पर इस मार्ग को हासिल करना संभव ही नहीं सहज भी है।
क्योंकि कृष्णधाम वह वृहद स्वरूप है मानवीय जीवन की समृद्धि, सभ्यता, संस्कार और शिक्षा का जिसे नकारा नहीं जा सकता। सवाल आज समझ का है। अगर इस सत्य को हमारी सभायें, परिषदें और सत्तायें समझ लें, तो कोई कारण नहीं जो हम पुनः एक मर्तवा फिर से खुशहाल, समृद्ध भारतवर्ष का निर्माण न कर सके। भले ही यह कहावत किसी परिपेक्ष में सटीक रही हो कि एक चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। मगर यह भी एक कटु सत्य है कि एक बीज से हजारों बीजों का सृजन और एक चिंगारी से बड़ी आग कि सत्यता को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए जब तक हम स्वराज को साक्षी मान कृष्णधाम के जीर्णोउद्धार की ओर अग्रसर नहीं होते तब तक हम विदवंशक शिक्षा, संस्कृति और संस्कारों का शिकार हो, जीवन की समृद्धि, खुशहाली से इसी तरह दूर होते रहेगें।
देखा जाये तो जिस महान भूभाग पर एक से एक कीर्तिमान कृतज्ञ, कत्र्तव्य निष्ठ लोगों ने जन्म लिया हो वह भूभाग कैसे उन विधा, विद्धवान, प्रतिभा, पुरूषार्थ के नाम पर बांझ हो सकता है। आज हम सभी के लिए यह सबसे बड़ी समझने वाली बात होना चाहिए।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर समुची संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों का निष्ठापूर्ण सार्थक अध्ययन पश्चात उनकी सटीक व्याख्या हो तो सत्य समझने में कोई संशय न होगा और सत्य शायद आज की स्थिति में यहीं है। जिसे हम कृष्ण के नाम से जानते है पहचानते है। जिसमें समृद्धि का मार्ग स्वतः ही निहित है और इस महान भूभाग पर इस मार्ग को हासिल करना संभव ही नहीं सहज भी है। क्योंकि कृष्णधाम वह वृहद स्वरूप है मानवीय जीवन की समृद्धि, सभ्यता, संस्कार और शिक्षा का जिसे नकारा नहीं जा सकता। सवाल आज समझ का है। अगर इस सत्य को हमारी सभायें, परिषदें और सत्तायें समझ लें, तो कोई कारण नहीं जो हम पुनः एक मर्तवा फिर से खुशहाल, समृद्ध भारतवर्ष का निर्माण न कर सके। भले ही यह कहावत किसी परिपेक्ष में सटीक रही हो कि एक चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। मगर यह भी एक कटु सत्य है कि एक बीज से हजारों बीजों का सृजन और एक चिंगारी से बड़ी आग कि सत्यता को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए जब तक हम स्वराज को साक्षी मान कृष्णधाम के जीर्णोउद्धार की ओर अग्रसर नहीं होते तब तक हम विदवंशक शिक्षा, संस्कृति और संस्कारों का शिकार हो, जीवन की समृद्धि, खुशहाली से इसी तरह दूर होते रहेगें।
देखा जाये तो जिस महान भूभाग पर एक से एक कीर्तिमान कृतज्ञ, कत्र्तव्य निष्ठ लोगों ने जन्म लिया हो वह भूभाग कैसे उन विधा, विद्धवान, प्रतिभा, पुरूषार्थ के नाम पर बांझ हो सकता है। आज हम सभी के लिए यह सबसे बड़ी समझने वाली बात होना चाहिए।
जय स्वराज
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