सामर्थ की सराहना अहम सत्य से विमुख समाज कभी समृद्ध, खुशहाल नहीं हो सकता


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सत्य का स्वरूप रूप जो भी हो उसे स्वीकारने में न तो किसी भी व्यक्ति को लज्जित होना चाहिए और न ही सत्य को अस्वीकार करना चाहिए। क्योंकि सत्य की स्वीकार्यता ही मानव ही नहीं अपितु समूचे जीव-जगत के कल्याण व उसकी समृद्धि, खुशहाली का मार्ग है। जिसके इतिहास में भी प्रमाण है और आज उसकी प्रमाणिकता भी है। जरूरत आज सत्य को साक्षी मान उसे सहर्ष स्वीकारने की है। 
जिस बात को कहने का सामर्थ केरल में सम्मानित, संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति ने दिखाया है वह सराहनीय ही कहा जायेगा। ये अलग बात है कि जिस सत्य को संवैधानिक पद पर स्वीकार्य किया गया उसकी अलोचना, प्रत्यालोचना होना, अज्ञानता, स्वार्थवत स्वभाविक है। मगर इस कलयुगी स्वार्थवत दौर में किसी ने तो सत्य को स्वीकारने का सामर्थ दिखाया, दृग्रभ्रमित समाजों को सही मार्ग दिखाया। क्योंकि अगर इतिहास, विरासत, सभ्यता, संस्कृति या वर्तमान को खंगाला जाये तो ब्रम्मत से वास्ता रखने वालों से इस सृष्टि में सर्व कल्याण की खातिर एक से बढ़कर एक त्याग, तपस्या, कुर्बानियां दी है और वह शब्द ब्रम्मत ही है। जिसका मूल्यांकन गुण दोष, आचरण, व्यवहार के माध्यम से अनादिकाल से लेकर आज तक होता रहा है। जिसकी प्रमाकिणता, सर्वोच्चता व्यक्ति के कर्म के रूप में रही है। फिर भी आज ब्रम्मत से इतनी ईश्र्या, द्वेश क्यों ? कहते है अगर ब्रम्मत, ब्राहम्मण को जानना है तो किसी भी मत, पंत, धर्म, ग्रंथों से सत्य को समझा जा सकता है। भारतवर्ष के परपेक्ष में महान ग्रंथ भगवत गीता ही नहीं, सुदामा को पढ़ा जा सकता है। फिर भी सत्य न मिले तो महान पवित्र ग्रंथ, रामायण से सीखा जा सकता है। जिसमें अपने प्राराब्र्ध वर्तमान में ब्रहम्मत की त्याग-तपस्या, पीड़ित, वंचित, आभावग्रस्त रहकर भी सन्तोष की बात मिलती है। ब्रहम्मत कोई हासिल करने या सीखना विषय-वस्तु नहीं। परन्तु सर्वकल्याण के लिए उसे अंगीकार कर जीवन में अनुभूति योग्य और संदेश वाहक के रूप में देखा जा सकता है। जिसकी उत्पत्ति ही सत्य के लिए हुई है। मगर इस कलयुग, स्वार्थपूर्ण, संस्कृति में ब्रम्मत का होना अफसोस नहीं, कर्म की बात होना चाहिए। मगर लोग आज ब्रम्मत पर शंका कर उसे स्वयं स्वार्थपूर्ति के लिए अपमानित ही नहीं सार्वजनिक रूप से भी दंण्डित करने से भी परहेज नहीं करते। 
कारण साफ है जिस भू-भाग पर ब्रम्मत ही नहीं माता-पिता, गुरूजन तक को निरअपराध होने के बावजूद भी कलंकित अपमानित होना पड़े वह भूभाग कैसे समृद्ध, खुशहाल हो सकता है और कैसे स्वार्थवत लोगों के आचरण व्यवहार से बच सकता है। कहते है सत्य की स्वीकार्यता ही सृष्टि का नियम है। 
जय स्वराज 

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