गांधी, सुभाष और नेहरू की काॅग्रेस पर सवाल
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिन महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस, पं. नेहरू, मौलाना आजाद, सरदार पटेल, शास्त्री, इन्दिरा के नाम से काॅग्रेस को जाना जाता है आज वह काॅग्रेस राष्ट्र हित में लिए निर्णय पर इस तरह से चुप रहेगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। जिस गांधी के कत्र्तव्य निर्वहन से ब्रितानियां हुकूमत व जिन सुभाषचन्द्र बोस के पुरूषार्थ से कांप उठी हो और आजाद भारत को पंचशील का सिद्धान्त और गुट निरपेक्ष की नीति विश्व को दे एक सैकड़ा अधिक राष्ट्रों का मंच तैयार किया हो। जिस शास्त्री और इन्दिरा के संकल्प के आगे पड़ोसी दुश्मन हथियार डालता रहा हो उस काॅग्रेस में ऐसी बैवसी दुर्भाग्य पूर्ण है। मौजूद काॅग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद में समूचे भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों की संख्या 543 है और 25 से अधिक राज्य व कई केन्द्र शासित प्रदेश है। केवल एक राज्य के कुछ नेताओं के अपने सियासी स्टैण्ड के चलते समूचे भारतवर्ष की महत्वकांक्षा पर चुप्पी ठीक नहीं। जिस नेहरू ने विश्व विरादरी में एक से एक शक्तिशाली संगठनों को दरकिनार कर एक बड़ा गुट निरपेक्ष आन्दोलन विश्व विरादरी में खड़ा करने का सामर्थ दिखाया हो। यह उनके सामर्थ की अनदेखी है।
सियासत में तर्क में भी होते और कुर्तक भी। मगर सियासी तर्क, कुर्तक के आगे परास्त काॅग्रेस की कमजोरी ही अभी तक उसके विरोधियों की ताकत रही है। कारण अहम मुद्दों पर काॅग्रेस की चुप्पी या फिर चंद स्वार्थी महत्वकांक्षी नेताओं के वेसर पैर के बयानों ने काॅग्रेस का बड़ा नुकसान किया है। काॅग्र्रेस के पास समय है कि वह भूल सुधार के साथ इतना तो कह सकती है कि वह देश के जनमत का अनादिकाल से सम्मान करती रही है और यहीं काॅग्रेस की ताकत है और उसकी आत्मा भी। अगर जनमत के आधार पर चुनी हुई सरकार का बहुमत राष्ट्र-जन हित में कोई निर्णय लेती है तो उस निर्णय से राष्ट्र-जन की खातिर काॅग्रेस कभी अलग हो ही नहीं सकती। चूंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था का तकाजा है कि हर सांसद सदन में अपने विवेक अनुसार सरकार के निर्णय पर विचार रख, मतदान कर सकता है यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सच है। जब काॅग्रेस का मूल आधार उसकी पहचान उसकी आत्मा उसकी जान ही राष्ट्र और जन है और 370 पर निर्णय लेने वाली सरकार जन मत से ही अस्तित्व में है तो फिर नेहरू की काॅग्रेस, राहुल की काॅग्रेस और सच्ची काॅग्रेस की असहमति राष्ट्र-जन हित के मुद्दे पर कैसे हो सकती है यहीं आज राष्ट्र-जन और सच्चे काॅग्रेसी इन्सानियत के पक्षधरों को समझने वाली बात होना चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिन महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस, पं. नेहरू, मौलाना आजाद, सरदार पटेल, शास्त्री, इन्दिरा के नाम से काॅग्रेस को जाना जाता है आज वह काॅग्रेस राष्ट्र हित में लिए निर्णय पर इस तरह से चुप रहेगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। जिस गांधी के कत्र्तव्य निर्वहन से ब्रितानियां हुकूमत व जिन सुभाषचन्द्र बोस के पुरूषार्थ से कांप उठी हो और आजाद भारत को पंचशील का सिद्धान्त और गुट निरपेक्ष की नीति विश्व को दे एक सैकड़ा अधिक राष्ट्रों का मंच तैयार किया हो। जिस शास्त्री और इन्दिरा के संकल्प के आगे पड़ोसी दुश्मन हथियार डालता रहा हो उस काॅग्रेस में ऐसी बैवसी दुर्भाग्य पूर्ण है। मौजूद काॅग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद में समूचे भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों की संख्या 543 है और 25 से अधिक राज्य व कई केन्द्र शासित प्रदेश है। केवल एक राज्य के कुछ नेताओं के अपने सियासी स्टैण्ड के चलते समूचे भारतवर्ष की महत्वकांक्षा पर चुप्पी ठीक नहीं। जिस नेहरू ने विश्व विरादरी में एक से एक शक्तिशाली संगठनों को दरकिनार कर एक बड़ा गुट निरपेक्ष आन्दोलन विश्व विरादरी में खड़ा करने का सामर्थ दिखाया हो। यह उनके सामर्थ की अनदेखी है। सियासत में तर्क में भी होते और कुर्तक भी। मगर सियासी तर्क, कुर्तक के आगे परास्त काॅग्रेस की कमजोरी ही अभी तक उसके विरोधियों की ताकत रही है। कारण अहम मुद्दों पर काॅग्रेस की चुप्पी या फिर चंद स्वार्थी महत्वकांक्षी नेताओं के वेसर पैर के बयानों ने काॅग्रेस का बड़ा नुकसान किया है। काॅग्र्रेस के पास समय है कि वह भूल सुधार के साथ इतना तो कह सकती है कि वह देश के जनमत का अनादिकाल से सम्मान करती रही है और यहीं काॅग्रेस की ताकत है और उसकी आत्मा भी। अगर जनमत के आधार पर चुनी हुई सरकार का बहुमत राष्ट्र-जन हित में कोई निर्णय लेती है तो उस निर्णय से राष्ट्र-जन की खातिर काॅग्रेस कभी अलग हो ही नहीं सकती। चूंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था का तकाजा है कि हर सांसद सदन में अपने विवेक अनुसार सरकार के निर्णय पर विचार रख, मतदान कर सकता है यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सच है। जब काॅग्रेस का मूल आधार उसकी पहचान उसकी आत्मा उसकी जान ही राष्ट्र और जन है और 370 पर निर्णय लेने वाली सरकार जन मत से ही अस्तित्व में है तो फिर नेहरू की काॅग्रेस, राहुल की काॅग्रेस और सच्ची काॅग्रेस की असहमति राष्ट्र-जन हित के मुद्दे पर कैसे हो सकती है यहीं आज राष्ट्र-जन और सच्चे काॅग्रेसी इन्सानियत के पक्षधरों को समझने वाली बात होना चाहिए।
Comments
Post a Comment