शुद्धिकरण का वक्त विरासत को कलंकित कर समृद्ध, खुशहाल, संस्कारिक राष्ट्र का निमार्ण असंभव

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वयं की समृद्ध, खुशहाल, संस्कारिक विरासत पर कीचड़ उछाल स्वयं की स्वार्थवत छवि चमकाने की जो सियासत इस महान राष्ट्र में विगत 3 दशक से पनपी है। अगर महान विरासत के उत्तराधिकारियों का सत्ता हासिल करने का संस्कार यहीं बना रहा तो कोई कारण नहीं जो हम भविष्य में असंस्कारी, अधर्मी, आचरण विहीन कौम के रूप में याद किये जाये। अब इसे हम अपना सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि जिस रास्ते पर आज सत्ता हासिल करने वाले या सभासद चल निकले है उसके सुखद परिणाम प्रमाणिक तौर पर हासिल हो, उसमें संशय ही जान पड़ता है। 
क्योंकि अन्याय के विरूद्ध जिस तरह से सत्ता आक्रमक है और विरोधी सभासद बैवस, मजबूर और दृघभ्रमित है। इसे देखकर लगता नहीं कि आने वाले समय में कुछ शुभ होने वाला है। ऐसे में सबसे बड़ी जबावदेही उन सांस्कृतिक, सामाजिक, संगठन उन वधिा, विद्यवानों और नागरिकों की है जो भविष्य के बारे में बेहतर तरीके से ज्ञान रखते है। क्योंकि न्याय का आधार अनादिकाल से सत्य ही रहा है। अगर राष्ट्र के सामाजिक, सांस्कृतिक, संगठन, विद्या-विद्यवान नागरिक, सत्ता, सभासदों सहित समाज सटीक मार्ग प्रस्त करने में सफल रहे तो कोई कारण नहीं जो हम अपना खोया गौरव हासिल करने में अक्षम, असफल साबित हो। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पूर्वज अनादिकाल से प्रकृति के सबसे बड़े रक्षक, संरक्षक, सम्बर्धक सत्य और न्याय के पक्षधर रहे है और उसी रूप में आज भी भारतवर्ष को जाना जाता है। जिन पूर्वजों ने कड़ी तपस्या कर अपना समूचा जीवन, जीव, जगत की सेवा, कल्याण और न्याय के लिये समर्पित किया तथा जिन्होंने अपना सारा सामर्थ, यौवन प्रकृति की रक्षा और न्याय के लिये स्वाहा किया हो ऐसे पूर्वजों से हमे सीख लेना चाहिए। 
देखा जाये तो विश्व का कोई भी विज्ञान, अध्यात्म भौतिक अनुभूति तो करा सकता है। मगर सत्य और न्याय के लिये सिर्फ और सिर्फ संस्कार, सामर्थ और पुरूषार्थ ही सार्थी बन सकता है। मगर सत्य का सच्चा अर्थ इस कलयुग, विज्ञान, अर्थयुग में काल चक्र या किसी भी जीव की सार्थक नैसर्गिक प्रकृति अनुरूप उसके परिणाम तथा उसकी प्राकृतिक पहचान विरूद्ध प्रमाणिक तौर पर साबित नहीं कर सकता जैसे कि आम के पेड़ में जामुन उगाना जो संभव नहीं। मगर इसके उलट काल चक्र प्रकृति अनुसार उत्पत्ति का विधान सिर्फ भारतवर्ष की महान नस्ल ही सत्य को साक्षी मान अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकती। अगर ऐसा हम कर पाये तो हम हमारा खोया गौरव हासिल कर, स्वयं को गौरान्वित करने में कतई संकोच महसूस नहीं करेगें। क्योंकि उत्पत्ति ही प्रकृति और प्रकृति में मौजूद जीवन का आधार प्रकृति है। कहते है उत्पत्ति इस महान भूभाग पर श्राफ नहीं एक वरदान है।
जय स्वराज   

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