मार्केटिंग, मिलकीयत महत्वकांक्षाओं के बीच दम तोड़ता लोक और तंत्र
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आजादी के 70 वर्ष बाद हमारा महान लोक और तंत्र जिस चैराहे पर खड़ा है वहां से समृद्धि खुशहाली शान्ति का मार्ग भले ही कुरूप नजर आये। मगर जो उथल-पुथल भरा संकट हमारे सामने नजर आता है वह बहुत ही डरावना जान पड़ता है। एक अदद भूल सुधार पर लोकतांत्रिक परम्परायें, निष्ठायें इस तरह बिखरी नजर आयेगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। जिसके चलते देश के अन्दर दुुश्मन तो देशवासियों के खून, पसीने से पोषित व्यवस्था समृद्ध, खुशहाल जीवन के मार्ग में काल नजर आये।
समीक्षा करनी होगी हमें हमारे आध्यात्म, उत्तरदायित्व कत्र्तव्य निर्वहन की, बरना हमारी कृतज्ञता के दुष्परिणाम कुरूप रूप में हमारे सामने हो इसमें किसी को अति संयोक्ति नहीं चाहिए। क्योंकि जिस तरह से हमारा लोकतंत्र मार्केटिंग, मिलकियत महत्वकांक्षा की जकड़ में है उसके सुखद परिणाम न मुमकिन ही नही असंभव है। हम महान विरासत के उतराधिकारियों को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए। क्योंकि न तो अब खुदीराम बोस, विस्मिल, भगत है न ही लाल बाल, पाल, गांधी, सुभाष जैसे वीर बलिदानी है। मार्केटिंग, मिलकीयत महत्वकांक्षा के दौर में अब तलाश उन जैसे महान बलिदानों की है। क्योंकि आजादी के वक्त अन्तिम पन्ति में खड़े व्यक्ति के संस्कारिक, आर्थिक कल्याण सेवा की बात हुई थी वह वर्ग आज भी वहीं का वहीं खड़ा है और समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिये संघर्ष कर रहा है। जो समर्थ होने बावजूद भी उन्हें उनकी समृद्धि का अक्स अनुभूति और एहसास नजर नहीं आ रहा। तो दूसरी ओर कुछ लोगों अकूत दौलत हासिल करने के बावजूद खुशहाल जीवन का मार्ग न तो नसीब हो पा रहा है न ही उनका जीवन शान्त नजर आ रहा है। देखा जाये तो आज अधिसंख्यक बचपन अभाव तो जबानी संघर्षरत है। वहीं बुढ़ापा आज उपेक्षा का शिकार हो रहा है। फिर क्षेत्र स्तर हैसियत जो भी हो। देखा जाये तो अर्थयुग के भ्रामक दंश से कराहते मानव जीवन को लोकतंत्र से बड़ी आस थी। मगर मार्केटिंग, मिलकीयत महत्वकांक्षा के सैलाब में सब कुछ जमीदोष होता जा रहा है। जो हम महान भूभाग विरासत के उतराधिकारियों के लिये शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी होना चािहए।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आजादी के 70 वर्ष बाद हमारा महान लोक और तंत्र जिस चैराहे पर खड़ा है वहां से समृद्धि खुशहाली शान्ति का मार्ग भले ही कुरूप नजर आये। मगर जो उथल-पुथल भरा संकट हमारे सामने नजर आता है वह बहुत ही डरावना जान पड़ता है। एक अदद भूल सुधार पर लोकतांत्रिक परम्परायें, निष्ठायें इस तरह बिखरी नजर आयेगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। जिसके चलते देश के अन्दर दुुश्मन तो देशवासियों के खून, पसीने से पोषित व्यवस्था समृद्ध, खुशहाल जीवन के मार्ग में काल नजर आये। समीक्षा करनी होगी हमें हमारे आध्यात्म, उत्तरदायित्व कत्र्तव्य निर्वहन की, बरना हमारी कृतज्ञता के दुष्परिणाम कुरूप रूप में हमारे सामने हो इसमें किसी को अति संयोक्ति नहीं चाहिए। क्योंकि जिस तरह से हमारा लोकतंत्र मार्केटिंग, मिलकियत महत्वकांक्षा की जकड़ में है उसके सुखद परिणाम न मुमकिन ही नही असंभव है। हम महान विरासत के उतराधिकारियों को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए। क्योंकि न तो अब खुदीराम बोस, विस्मिल, भगत है न ही लाल बाल, पाल, गांधी, सुभाष जैसे वीर बलिदानी है। मार्केटिंग, मिलकीयत महत्वकांक्षा के दौर में अब तलाश उन जैसे महान बलिदानों की है। क्योंकि आजादी के वक्त अन्तिम पन्ति में खड़े व्यक्ति के संस्कारिक, आर्थिक कल्याण सेवा की बात हुई थी वह वर्ग आज भी वहीं का वहीं खड़ा है और समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिये संघर्ष कर रहा है। जो समर्थ होने बावजूद भी उन्हें उनकी समृद्धि का अक्स अनुभूति और एहसास नजर नहीं आ रहा। तो दूसरी ओर कुछ लोगों अकूत दौलत हासिल करने के बावजूद खुशहाल जीवन का मार्ग न तो नसीब हो पा रहा है न ही उनका जीवन शान्त नजर आ रहा है। देखा जाये तो आज अधिसंख्यक बचपन अभाव तो जबानी संघर्षरत है। वहीं बुढ़ापा आज उपेक्षा का शिकार हो रहा है। फिर क्षेत्र स्तर हैसियत जो भी हो। देखा जाये तो अर्थयुग के भ्रामक दंश से कराहते मानव जीवन को लोकतंत्र से बड़ी आस थी। मगर मार्केटिंग, मिलकीयत महत्वकांक्षा के सैलाब में सब कुछ जमीदोष होता जा रहा है। जो हम महान भूभाग विरासत के उतराधिकारियों के लिये शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी होना चािहए।
जय स्वराज
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