पराक्रम, पहचान के नाम, बांझ होती मदमस्त आशा आकाक्षायें अंधा, अलाल, मंत्रमुग्ध, पुरूषार्थ हुआ सामर्थ का मोहताज कत्र्तव्य विमुखता के बीच खुशहाली को छटपटाता सुसंस्कृत, समृद्ध भूभाग
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, भूभाग की समृद्धि, खुशहाली में संस्थाओं, संगठन, समूह, सत्ताओं, सभा, परिषदों का बड़ा योगदान होता है। जो बच्चों को उन्मुक्त स्वच्छंद, समृद्ध वातावरण तो युवाओं को उनके सामर्थ पुरूषार्थ अनुसार संरक्षण दें, उन्हें संसाधन, मार्गदर्शन मुहैया कराते है और बुजुर्गो को उनके शेष समृद्ध जीवन की गारन्टी। मगर सुसंस्कृत, समृद्ध, शिक्षा, संस्कारों के अभाव तथा लोकतंत्र में सत्ता, सभा, परिषद, संस्था, संगठनों को औपचारिक अनौपचारिक तौर पर संचालित करने वाले तथाकथित स्वार्थी महत्वकांक्षी व्यक्ति, समूह, लिमिटेड प्रायवेट काॅपरेट कल्चर में अघोषित रूप से तब्दील संगठनों और गिरोहबंद नीत के चलते जहां अति स्वार्थ, महत्वकांक्षा का प्रार्दुभाव हुआ है जो न तो एक समृद्ध सुसंस्कृत शिक्षा स्थापित कर सकी, न ही पुरूषार्थ, सामर्थ को संरक्षण परिणाम कि आज एक सुसंस्कृत, समृद्ध भूभाग पर पराक्रम, पहचान के नाम बांझ मदमस्त आशा-आकांक्षाओं का अम्बार टिका है तो वहीं दूसरी ओर अंधा, अलाल मंत्रमुग्ध पुरूषार्थ, सामर्थ को मोहताज है। कत्र्तव्य विमुखता के सैलाब में खुशहाल जीवन को छटपटाती समृद्धि सुसंस्कृत होने के बावजूद सामर्थ, पुरूषार्थ की मोहताज है जहां तक कि किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, भूभाग की समृद्धि, खुशहाली का सवाल है तो इसके लिये सुसंस्कृत शिक्षित सामाजिक सरोकार और साधन, संसाधनों से अर्थनीत के साथ सेवाभावी, समृद्ध कल्याणकारी सत्ताओं के लिये स्वच्छंद समृद्धि राजनीत होना आवश्यक है जो हमें सुसंस्कृत, समृद्ध शिक्षा ही दे सकती है। जिसका यंत्र युक्त, बैजान अंको की मूल्यांकन युक्त पराधीन शिक्षा के चलते उस समृद्ध, सुसंस्कृत, शिक्षा का आज भी अभाव है। जहां अध्यात्म, तकनीक, उत्पादन, परिश्रम नये-नये आयडिया, क्रियान्वयन के चलते संस्कार, समृद्धि, विद्धवतता ज्ञान का प्रमाणिक आधार था। जो हमारी प्रमाणिकता भी है और पहचान।
मगर जिस तरह से अंक प्रतिशत का मकड़ाजाल हमारी प्रतिभाओं को जकड़ और युवाओं को गैंगबंद काॅरपोरेट कल्चर राजनीति की जकड़ तथा बुजुर्ग नौनिहालों के बेहतर भविष्य के इंतजार में है। ऐसे में लगता नहीं कि कत्र्तव्य विमुख होती जबावदेहियों से बहुत कुछ हासिल होने वाला है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, भूभाग की समृद्धि, खुशहाली में संस्थाओं, संगठन, समूह, सत्ताओं, सभा, परिषदों का बड़ा योगदान होता है। जो बच्चों को उन्मुक्त स्वच्छंद, समृद्ध वातावरण तो युवाओं को उनके सामर्थ पुरूषार्थ अनुसार संरक्षण दें, उन्हें संसाधन, मार्गदर्शन मुहैया कराते है और बुजुर्गो को उनके शेष समृद्ध जीवन की गारन्टी। मगर सुसंस्कृत, समृद्ध, शिक्षा, संस्कारों के अभाव तथा लोकतंत्र में सत्ता, सभा, परिषद, संस्था, संगठनों को औपचारिक अनौपचारिक तौर पर संचालित करने वाले तथाकथित स्वार्थी महत्वकांक्षी व्यक्ति, समूह, लिमिटेड प्रायवेट काॅपरेट कल्चर में अघोषित रूप से तब्दील संगठनों और गिरोहबंद नीत के चलते जहां अति स्वार्थ, महत्वकांक्षा का प्रार्दुभाव हुआ है जो न तो एक समृद्ध सुसंस्कृत शिक्षा स्थापित कर सकी, न ही पुरूषार्थ, सामर्थ को संरक्षण परिणाम कि आज एक सुसंस्कृत, समृद्ध भूभाग पर पराक्रम, पहचान के नाम बांझ मदमस्त आशा-आकांक्षाओं का अम्बार टिका है तो वहीं दूसरी ओर अंधा, अलाल मंत्रमुग्ध पुरूषार्थ, सामर्थ को मोहताज है। कत्र्तव्य विमुखता के सैलाब में खुशहाल जीवन को छटपटाती समृद्धि सुसंस्कृत होने के बावजूद सामर्थ, पुरूषार्थ की मोहताज है जहां तक कि किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, भूभाग की समृद्धि, खुशहाली का सवाल है तो इसके लिये सुसंस्कृत शिक्षित सामाजिक सरोकार और साधन, संसाधनों से अर्थनीत के साथ सेवाभावी, समृद्ध कल्याणकारी सत्ताओं के लिये स्वच्छंद समृद्धि राजनीत होना आवश्यक है जो हमें सुसंस्कृत, समृद्ध शिक्षा ही दे सकती है। जिसका यंत्र युक्त, बैजान अंको की मूल्यांकन युक्त पराधीन शिक्षा के चलते उस समृद्ध, सुसंस्कृत, शिक्षा का आज भी अभाव है। जहां अध्यात्म, तकनीक, उत्पादन, परिश्रम नये-नये आयडिया, क्रियान्वयन के चलते संस्कार, समृद्धि, विद्धवतता ज्ञान का प्रमाणिक आधार था। जो हमारी प्रमाणिकता भी है और पहचान।
मगर जिस तरह से अंक प्रतिशत का मकड़ाजाल हमारी प्रतिभाओं को जकड़ और युवाओं को गैंगबंद काॅरपोरेट कल्चर राजनीति की जकड़ तथा बुजुर्ग नौनिहालों के बेहतर भविष्य के इंतजार में है। ऐसे में लगता नहीं कि कत्र्तव्य विमुख होती जबावदेहियों से बहुत कुछ हासिल होने वाला है।
जय स्वराज

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