भारत के चरित्र, आचरण, भाव की संक्षिप्त समीक्षा शान्ति, सर्वकल्याण, मूल आधार, विश्व मंच के 184 देशों को भारतवर्ष का सार्थक संदेश हजारों वर्ष पुरानी समृद्ध, संस्कृति, संस्कार हमारा सामर्थ पुरूषार्थ का प्रमाण बडी विरासत, बडे लक्ष्य शान्ति सर्वकल्याण महान भारतवर्ष का कत्र्तव्य विश्व मंच पर दुरूस्त बोले मोदी
व्ही.एस.भुल्ले
समस्त मानव जीव, जगत का कल्याण हमारा मूल सिद्धान्त का भाव और जन्म तथा अंत के बीच का सार्थक प्रकृति प्रदत्त सिद्धान्त अनुरूप हमारा कत्र्तव्य निर्वहन हमारी मूल संस्कृति का भाव है। जो भारतवर्ष की बहुमूल्य विरासत भी है और हमारे संस्कार भी। जो हर भारतवर्ष के नागरिक में भरा पडा है। भारतवर्ष में शोषण नहीं, पोषण विनाश नहीं, सृजन के पक्षधर लोगों की संस्कृति रही है। हम स्वयं नहीं सर्वकल्याण के भाव के साथ जीते है और स्वयं के सामर्थ, पुरूषार्थ के बल समृद्ध खुशहाल जीवन के लिए जीवन पर्यन्त संघर्षरत रहते है। जो हमारे भाव ही नहीं आचरण और चरित्र से भी स्पष्ट है। हम भारतवर्ष के लोग स्नेह, प्रेम, शान्ति और समृद्ध, खुशहाल जीवन के सार्थी तथा सर्वकल्याण के भाव में लिप्त संस्कृति के उत्तराधिकारी है। यहीं भाव हजारों वर्ष से इस महान भूभाग भारतवर्ष का रहा है। इतिहास गवाह है यहीं बात आज समूचे विश्व की मानवता को भारतवर्ष के संदर्भ में समझने वाली होना चाहिए। जो समूची विश्व विरादरी ही नहीं मानवता में आस्था, विश्वास रखने वाले राष्ट्र और मानव के लिए हो सकती है।
जय स्वराज
समस्त मानव जीव, जगत का कल्याण हमारा मूल सिद्धान्त का भाव और जन्म तथा अंत के बीच का सार्थक प्रकृति प्रदत्त सिद्धान्त अनुरूप हमारा कत्र्तव्य निर्वहन हमारी मूल संस्कृति का भाव है। जो भारतवर्ष की बहुमूल्य विरासत भी है और हमारे संस्कार भी। जो हर भारतवर्ष के नागरिक में भरा पडा है। भारतवर्ष में शोषण नहीं, पोषण विनाश नहीं, सृजन के पक्षधर लोगों की संस्कृति रही है। हम स्वयं नहीं सर्वकल्याण के भाव के साथ जीते है और स्वयं के सामर्थ, पुरूषार्थ के बल समृद्ध खुशहाल जीवन के लिए जीवन पर्यन्त संघर्षरत रहते है। जो हमारे भाव ही नहीं आचरण और चरित्र से भी स्पष्ट है। हम भारतवर्ष के लोग स्नेह, प्रेम, शान्ति और समृद्ध, खुशहाल जीवन के सार्थी तथा सर्वकल्याण के भाव में लिप्त संस्कृति के उत्तराधिकारी है। यहीं भाव हजारों वर्ष से इस महान भूभाग भारतवर्ष का रहा है। इतिहास गवाह है यहीं बात आज समूचे विश्व की मानवता को भारतवर्ष के संदर्भ में समझने वाली होना चाहिए। जो समूची विश्व विरादरी ही नहीं मानवता में आस्था, विश्वास रखने वाले राष्ट्र और मानव के लिए हो सकती है। जय स्वराज
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