मूल्य गंवाती सियासत से, संघर्ष की तैयारी
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भाजपा की जननी कहलाने वाली प्रभावी संस्थापक सदस्यों में से एक कै. राजमाता विजयाराजे सिंधिया के संघर्ष की याद भाजपा का आन्दोलन देख ताजा हो र्गइं। जब उनकी पुत्री पूर्व मंत्री म.प्र. शासन श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया पार्टी के एक कार्यक्रम की खातिर सडक पर पैदल मार्च करती दिखी। हालांकि इस मौके पर उनके साथ बड़ी संख्या में स्थानीय नेता, विधायक व बड़ी संख्या में कार्यकत्र्ता मौजूद थे। मूल्य सिद्धान्तों की और जन समस्याओं की खातिर ऐसा नहीं कि सिंधिया परिवार का संघर्ष पहली मर्तवा सड़क पर दिख रहा हो। बल्कि इसकी नींव तो कै. राजमाता विजयाराजे सिंधिया 50 वर्ष पूर्व ही रख रख थी और संघर्ष की सियासत का ककहरा राजमाता ने अपने बच्चों में भी संस्कार स्वरूप डाला। परिणाम कै. श्रीमंत माधवराव सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री बसुन्धरा राजे सिंधिया, म.मप्र शासन की पूर्व मंत्री व विधायक श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया तथा काॅग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया के रूप में देखा जा सकता है। जिन्होंने मूल्य सिद्धान्त जनहित की खातिर सत्ता को तो छोड़ा मगर सार्वजनिक जीवन में कभी मूल्य, सिद्धान्त व सर्वकल्याण की सियासत को नहीं छोड़ा आज की सियासत में जहां लोग सत्ता के लिये मूल्य सिद्धान्त, जनकल्याण की सियासत की चिता पर गौरव, वैभव के महल खड़े करना चाहते है। ऐसे में कै. श्रीमंत राजमाता सिंधिया जैसी शख्सियतों का जनहित में प्रसांगिक होना स्वभाविक है। म.प्र. में डीपी मिश्रा सरकार के पतन से लेकर स्व. इन्दिरा गांधी जैसी शख्सियत से चुनाव लड़ना भाजपा स्थापना से लेकर राम मन्दिर आन्दोलन की अगुवा बन कारसेवक के रूप में सार्वजनिक स्वीकारोंक्ति किसी के भी दुःख दर्द को देख व्यथित हो जाना तथा निराकरण होने तक संघर्षरत रहना उनके जीवन में सुमार था। इतना ही नहीं, प्रतिभा की पहचान और उसे मुकाम तक पहुंचाना वह अपना कत्र्तव्य समझती थी। अटल, आडवाणी एवं भैरोसिंह शेखावत सुषमा स्वराज, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, साध्वी उमा भारती ऐसे कई नाम है। जिनको औपचारिक अनौपचारिक रूप से राजमाता का प्रभावी सानिध्य मिला। उनके जन्मदिन पर व्याख्या के लिये विषय तो और भी है। मगर आज की सियासत ऐसी पवित्र आत्माओं से कुछ सीख पाये, तो यह आज की सियासत के लिये दूर की कोणी साबित होगी। मगर सरकार बनाने व पटखने खेल में स्वाहा होता लोकतंत्र कब मूल्य सिद्धान्तों की राजनीति के मार्ग पर चल सशक्त होगा यह कहना फिलहाल मुश्किल है। मगर विगत 15 वर्षो से सत्ता सुख भोग रही भाजपा ने जिस तरह से म.प्र. की काॅग्रेस सरकार को उखाड़ फैंकने का शंखनाद सड़कों पर शुरू किया है और जिस तरह से उनकी पुत्री ने संघर्ष मार्ग चुना है। देखना होगा कि कब और कैसे यह सार्थक होता है या फिर मौजूद मूल विहीन सियासत में दम तोड़ जाता है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भाजपा की जननी कहलाने वाली प्रभावी संस्थापक सदस्यों में से एक कै. राजमाता विजयाराजे सिंधिया के संघर्ष की याद भाजपा का आन्दोलन देख ताजा हो र्गइं। जब उनकी पुत्री पूर्व मंत्री म.प्र. शासन श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया पार्टी के एक कार्यक्रम की खातिर सडक पर पैदल मार्च करती दिखी। हालांकि इस मौके पर उनके साथ बड़ी संख्या में स्थानीय नेता, विधायक व बड़ी संख्या में कार्यकत्र्ता मौजूद थे। मूल्य सिद्धान्तों की और जन समस्याओं की खातिर ऐसा नहीं कि सिंधिया परिवार का संघर्ष पहली मर्तवा सड़क पर दिख रहा हो। बल्कि इसकी नींव तो कै. राजमाता विजयाराजे सिंधिया 50 वर्ष पूर्व ही रख रख थी और संघर्ष की सियासत का ककहरा राजमाता ने अपने बच्चों में भी संस्कार स्वरूप डाला। परिणाम कै. श्रीमंत माधवराव सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री बसुन्धरा राजे सिंधिया, म.मप्र शासन की पूर्व मंत्री व विधायक श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया तथा काॅग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया के रूप में देखा जा सकता है। जिन्होंने मूल्य सिद्धान्त जनहित की खातिर सत्ता को तो छोड़ा मगर सार्वजनिक जीवन में कभी मूल्य, सिद्धान्त व सर्वकल्याण की सियासत को नहीं छोड़ा आज की सियासत में जहां लोग सत्ता के लिये मूल्य सिद्धान्त, जनकल्याण की सियासत की चिता पर गौरव, वैभव के महल खड़े करना चाहते है। ऐसे में कै. श्रीमंत राजमाता सिंधिया जैसी शख्सियतों का जनहित में प्रसांगिक होना स्वभाविक है। म.प्र. में डीपी मिश्रा सरकार के पतन से लेकर स्व. इन्दिरा गांधी जैसी शख्सियत से चुनाव लड़ना भाजपा स्थापना से लेकर राम मन्दिर आन्दोलन की अगुवा बन कारसेवक के रूप में सार्वजनिक स्वीकारोंक्ति किसी के भी दुःख दर्द को देख व्यथित हो जाना तथा निराकरण होने तक संघर्षरत रहना उनके जीवन में सुमार था। इतना ही नहीं, प्रतिभा की पहचान और उसे मुकाम तक पहुंचाना वह अपना कत्र्तव्य समझती थी। अटल, आडवाणी एवं भैरोसिंह शेखावत सुषमा स्वराज, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, साध्वी उमा भारती ऐसे कई नाम है। जिनको औपचारिक अनौपचारिक रूप से राजमाता का प्रभावी सानिध्य मिला। उनके जन्मदिन पर व्याख्या के लिये विषय तो और भी है। मगर आज की सियासत ऐसी पवित्र आत्माओं से कुछ सीख पाये, तो यह आज की सियासत के लिये दूर की कोणी साबित होगी। मगर सरकार बनाने व पटखने खेल में स्वाहा होता लोकतंत्र कब मूल्य सिद्धान्तों की राजनीति के मार्ग पर चल सशक्त होगा यह कहना फिलहाल मुश्किल है। मगर विगत 15 वर्षो से सत्ता सुख भोग रही भाजपा ने जिस तरह से म.प्र. की काॅग्रेस सरकार को उखाड़ फैंकने का शंखनाद सड़कों पर शुरू किया है और जिस तरह से उनकी पुत्री ने संघर्ष मार्ग चुना है। देखना होगा कि कब और कैसे यह सार्थक होता है या फिर मौजूद मूल विहीन सियासत में दम तोड़ जाता है।
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