म.प्र.: मिलावट के खिलाफ मुख्यमंत्री का फ्री हेन्ड- मुख्य सचिव अलाली में मस्त मातहत
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाम्इस समाचार सेवा।
पुष्ट तथ्यों के आभाव में अपुष्ट खबर यह है कि अलाली में मस्त मातहतों की कत्र्तव्य विमुखता का परिणाम है कि म.प्र. में बड़े पैमाने पर मिलावटखोरी इस बात से भी स्पष्ट हो जाती है कि ग्वालियर में एक बैठक के दौरान म.प्र. शासन के मुख्य सचिव एसआर मोहन्ती ने भी स्पष्ट किया है कि मिलावट करने वालों पर टूट पड़ो क्योंकि मिलावटियों के खिलाफ कार्यवाही करने मुख्यमंत्री ने शासन को फ्री हेन्ड दिया है। उन्होंने तर्क भी दिया कि उत्पादन से अधिक दूध की बाजार में उपलब्धता इस बात का प्रमाण है कि मिलावट किस स्तर पर हो रही है।
मगर यक्ष सवाल यह है कि क्या मिलावट का इतना बड़ा कारोबार रातों रात फल फूल व समूचे प्रदेश पैर पसार सकता है। ऐसे में उत्तर होगा नहीं, तो मतलब साफ है कि इस मिलावटखोरी के धंधे को पनपने में कई वर्ष लगे होंगे। मगर इस सवाल का उत्तर शायद मुख्य सचिव के पास हो कि मिलावटखोरी रोकने तैनात शासन के मातहत अभी तक मोटी पगार ले, कौन से कत्र्तव्यों का पालन निष्ठापूर्ण तरीके से करते रहे जो मिलावटखोरी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ गई। आखिर वो लोग कौन है जिनके संरक्षण में मिलावटखोरों का कारवां म.प्र. में बड़ा और वर्षो तक लोगों की जान से खेलता रहा। अगर मिलावट को लेकर बात दूध तक ही सीमित होती ऐसा नहीं क्या घी, पनीर, खादय तेल, खाद, कृषि खाद, दवा सभी क्षेत्रों में मिलावट की चर्चायें आम है। मगर प्रभावी कानून और कार्यवाही तथा कत्र्तव्य विमुख लोगों के रहते आज मिलावट को लेकर हालात बेकाबू है, न तो फिलहाल मिलावट रोकने पर्याप्त कत्र्तव्यनिष्ठ ईमानदार अमला है और न ही संसाधन। ऐसे में सबकुछ ठीक होगा कहना फिलहाल बैमानी होगा। क्योंकि म.प्र. में एक माह बाद भी परिणाम फिलहाल प्रमाणिक नहीं। ऐसे में नहीं लगता कि मिलावटखोरों पर कोई प्रभावी फर्क पड़ने वाला है।
विलेज टाम्इस समाचार सेवा।
पुष्ट तथ्यों के आभाव में अपुष्ट खबर यह है कि अलाली में मस्त मातहतों की कत्र्तव्य विमुखता का परिणाम है कि म.प्र. में बड़े पैमाने पर मिलावटखोरी इस बात से भी स्पष्ट हो जाती है कि ग्वालियर में एक बैठक के दौरान म.प्र. शासन के मुख्य सचिव एसआर मोहन्ती ने भी स्पष्ट किया है कि मिलावट करने वालों पर टूट पड़ो क्योंकि मिलावटियों के खिलाफ कार्यवाही करने मुख्यमंत्री ने शासन को फ्री हेन्ड दिया है। उन्होंने तर्क भी दिया कि उत्पादन से अधिक दूध की बाजार में उपलब्धता इस बात का प्रमाण है कि मिलावट किस स्तर पर हो रही है। मगर यक्ष सवाल यह है कि क्या मिलावट का इतना बड़ा कारोबार रातों रात फल फूल व समूचे प्रदेश पैर पसार सकता है। ऐसे में उत्तर होगा नहीं, तो मतलब साफ है कि इस मिलावटखोरी के धंधे को पनपने में कई वर्ष लगे होंगे। मगर इस सवाल का उत्तर शायद मुख्य सचिव के पास हो कि मिलावटखोरी रोकने तैनात शासन के मातहत अभी तक मोटी पगार ले, कौन से कत्र्तव्यों का पालन निष्ठापूर्ण तरीके से करते रहे जो मिलावटखोरी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ गई। आखिर वो लोग कौन है जिनके संरक्षण में मिलावटखोरों का कारवां म.प्र. में बड़ा और वर्षो तक लोगों की जान से खेलता रहा। अगर मिलावट को लेकर बात दूध तक ही सीमित होती ऐसा नहीं क्या घी, पनीर, खादय तेल, खाद, कृषि खाद, दवा सभी क्षेत्रों में मिलावट की चर्चायें आम है। मगर प्रभावी कानून और कार्यवाही तथा कत्र्तव्य विमुख लोगों के रहते आज मिलावट को लेकर हालात बेकाबू है, न तो फिलहाल मिलावट रोकने पर्याप्त कत्र्तव्यनिष्ठ ईमानदार अमला है और न ही संसाधन। ऐसे में सबकुछ ठीक होगा कहना फिलहाल बैमानी होगा। क्योंकि म.प्र. में एक माह बाद भी परिणाम फिलहाल प्रमाणिक नहीं। ऐसे में नहीं लगता कि मिलावटखोरों पर कोई प्रभावी फर्क पड़ने वाला है।
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