सच से दूर, सपनों का जनाजा
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सपना तो हर मानव का किसी भी व्यवस्था में अपनी सत्ता, सरकार, सभा, परिषदों से पूरा करने का होता ही है। जिससे वह उन्हें व उनके नौनिहालों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, शुद्ध खादन्न, पेयजल और सुरक्षा मुहैया करा उनका व उनके नौनिहालों का जीवन समृद्ध, खुशहाल बनाने का मार्ग स्वयं की कृतज्ञता के चलते प्रस्त कर सके। जिसमें लोक कत्र्तव्य निष्ठ और तंत्र जबावदेह हो। जिससे राज व्यवस्था मजबूत समृद्ध, सशक्त हो, लोग जनकल्याण और सेवा का कार्य मुस्तैदी से हो सके। अब इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि लोकतंत्र व्यवस्था के जबावदेह लोग संस्था, संगठन सतत सत्ता में रह सेवा कल्याण की नीतियां सत्ता हित को सामने रख बना काॅरपोरेट कल्चर आधार पर क्रियान्वित करना चाहते है। तो वहीं लोकतंत्र का दूसरा भाग अपनी अंधी आशा-आकांशाआंे को पूर्ण करने और अपनी आने वाली पीढ़ियों को सपने साकार करने संवैधानिक दायित्वों का मानवीय नैतिक कत्र्तव्यों को दरकिनार कर सत्ता के सुर में सुर मिला अहंकार पूर्वक अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करना चाहता है। जिसके लिये शायद मानवीयता और कत्र्तव्य विमुखता कोई मायने नहीं रखती। मगर इस हालात में आम समझबूझ विधा, विद्धवता और पुरूषार्थ सहित सर्वकल्याण के भाव से भरे लोगों को समझने वाली बात सिर्फ इतनी है कि स्वयं स्वार्थ, अहम अहंकार में डूब एवं प्राकृतिक मानवीय मूल सिद्धान्तों को धता बता जिस तरह से ऐसी अघोषित व्यवस्था का निर्माण हमारे माननीय श्रीमान तथाकथित आंकड़ों के मखड़जाल व प्रतिशत के आधार पर विधा, विद्ववान, प्रतिभाओं का आकलन करने वाले जुटे है। उस अघोषित व्यवस्था का स्वरूप इतना वीभत्स हो सकता है शायद उसका आंकलन का अनुमान आज भले ही हमें और उन्हें न हो। मगर एक बात सत्य है कि हम अपने कत्र्तव्य निर्वहन और पुरूषार्थ से जिस अघोषित व्यवस्था और भविष्यों का निर्माण करने में जुटे है। एक न एक दिन हमें भी उन्हीं के साथ शेष जीवन निर्वहन करने मजबूर होना पड़ेगा। भले ही आज हम हमारे माननीय, श्रीमान जिस भी पद प्रतिष्ठा पर सत्ता, सरकार, सभा, परिषदों में हो या जिस भी वर्ग समाज से हमारा वास्ता क्यों न हो।
अगर हम इसी मार्ग पर आगे बढ़ते रहे तो किसी को यह अतिसंयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि किसी का भी जीवन, सफल, समृद्ध, खुशहाल और प्राकृतिक मूल्य सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं रहने वाला है। समय शेष है और सुधार की गुजांइस भी मौजूद। अगर समय रहते हम अपने स्थापित मूल्य सिद्धान्तों और प्राकृतिक नैसर्गिक गुणों के अनुरूप अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को समृद्ध, मजबूत बना पाये तो यह हमारी सबसे बड़ी सफलता और मानवीय जीवन में एक बड़ी सिद्धि होगी।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सपना तो हर मानव का किसी भी व्यवस्था में अपनी सत्ता, सरकार, सभा, परिषदों से पूरा करने का होता ही है। जिससे वह उन्हें व उनके नौनिहालों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, शुद्ध खादन्न, पेयजल और सुरक्षा मुहैया करा उनका व उनके नौनिहालों का जीवन समृद्ध, खुशहाल बनाने का मार्ग स्वयं की कृतज्ञता के चलते प्रस्त कर सके। जिसमें लोक कत्र्तव्य निष्ठ और तंत्र जबावदेह हो। जिससे राज व्यवस्था मजबूत समृद्ध, सशक्त हो, लोग जनकल्याण और सेवा का कार्य मुस्तैदी से हो सके। अब इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि लोकतंत्र व्यवस्था के जबावदेह लोग संस्था, संगठन सतत सत्ता में रह सेवा कल्याण की नीतियां सत्ता हित को सामने रख बना काॅरपोरेट कल्चर आधार पर क्रियान्वित करना चाहते है। तो वहीं लोकतंत्र का दूसरा भाग अपनी अंधी आशा-आकांशाआंे को पूर्ण करने और अपनी आने वाली पीढ़ियों को सपने साकार करने संवैधानिक दायित्वों का मानवीय नैतिक कत्र्तव्यों को दरकिनार कर सत्ता के सुर में सुर मिला अहंकार पूर्वक अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करना चाहता है। जिसके लिये शायद मानवीयता और कत्र्तव्य विमुखता कोई मायने नहीं रखती। मगर इस हालात में आम समझबूझ विधा, विद्धवता और पुरूषार्थ सहित सर्वकल्याण के भाव से भरे लोगों को समझने वाली बात सिर्फ इतनी है कि स्वयं स्वार्थ, अहम अहंकार में डूब एवं प्राकृतिक मानवीय मूल सिद्धान्तों को धता बता जिस तरह से ऐसी अघोषित व्यवस्था का निर्माण हमारे माननीय श्रीमान तथाकथित आंकड़ों के मखड़जाल व प्रतिशत के आधार पर विधा, विद्ववान, प्रतिभाओं का आकलन करने वाले जुटे है। उस अघोषित व्यवस्था का स्वरूप इतना वीभत्स हो सकता है शायद उसका आंकलन का अनुमान आज भले ही हमें और उन्हें न हो। मगर एक बात सत्य है कि हम अपने कत्र्तव्य निर्वहन और पुरूषार्थ से जिस अघोषित व्यवस्था और भविष्यों का निर्माण करने में जुटे है। एक न एक दिन हमें भी उन्हीं के साथ शेष जीवन निर्वहन करने मजबूर होना पड़ेगा। भले ही आज हम हमारे माननीय, श्रीमान जिस भी पद प्रतिष्ठा पर सत्ता, सरकार, सभा, परिषदों में हो या जिस भी वर्ग समाज से हमारा वास्ता क्यों न हो। अगर हम इसी मार्ग पर आगे बढ़ते रहे तो किसी को यह अतिसंयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि किसी का भी जीवन, सफल, समृद्ध, खुशहाल और प्राकृतिक मूल्य सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं रहने वाला है। समय शेष है और सुधार की गुजांइस भी मौजूद। अगर समय रहते हम अपने स्थापित मूल्य सिद्धान्तों और प्राकृतिक नैसर्गिक गुणों के अनुरूप अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को समृद्ध, मजबूत बना पाये तो यह हमारी सबसे बड़ी सफलता और मानवीय जीवन में एक बड़ी सिद्धि होगी।
जय स्वराज
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