स्व नहीं सर्वकल्याण, शान्ति है भारतवर्ष का मूल आधार समृद्ध, खुशहाल, जीवन के मूल्य सिद्धान्त और सामर्थ से भरी है हमारी संस्कृति

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
ये अलहदा बात है कि हम क्या थे और क्या है। मगर जब बात आर्थिक समृद्धि, खुशहाल जीवन की हो ऐसे में अतीत वर्तमान की समीक्षा अवश्यम भावी हो जाती है। जिस काॅम का प्रारव्ध अन्तिम लक्ष्य स्व नहीं सर्वकल्याण शान्ति, समभाव का रहा हो। जिस भारतवर्ष के समृद्ध अस्तित्व को उसका मूल आधार माना जाता रहा हो। यहां तक कि आक्रान्ताओं की बैहिसाब मारकाट अत्याचार महालूट का इतिहास रहते 200 वर्ष की गुलामी भी हमारी आर्थिक समृद्धि का ढांचा न तोड़ सकी और जो डाॅलर आजादी के वक्त एक रूपये के बराबर रहा हो वह एक डाॅलर आज 72 रूपये के पार कैसे हो सकता है। कैसे हमारे समृद्ध, गांव, गली, कुटीर, लघु, व्रहत उघोग कंगाल हो सकते है। आज यहीं यक्ष सवाल इस महान भारतवर्ष के विधा, विद्ववान, गरीब, किसान उघोगों के सामने होना चाहिए।
कारण साफ है स्व अतिवादी, सतत, स्वयं भू सोच के साथ सत्ताओं का शासन करना और सतत सत्ता में बने रहने की नीतियांे के निर्माण में जुटे रहना है। क्योंकि जो राष्ट्र 70 वर्ष में भी अपनी समृद्ध, खुशहाल शिक्षा को बचा पुर्नस्थापित कर समय अनुसार आर्थिक नीति बनाने में अक्षम असफल रहा वह कैसे कल्पना कर सकता है कि वह अपने विधा, विद्ववान, प्रतिभाओं का अनजाने में ही सही, दमन कर समृद्ध, खुशहाल बन सकता है। 
कहते है कि भारतवर्ष ही समूचे विश्व में प्राकृतिक सम्पदा से समृद्ध भूभाग है। इसलिये इस भूभाग को जननी मातृ भूमि माँ के नाम से यहां जन्म लेने वाले लोग हजारों वर्षो से सम्मानित उच्चाकरण स्वयं पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित महसूस करते है। मगर जनतंत्र, लोकतंत्र में सेवा संगठनों का काॅरपोरेट, लिमिटेड, गिरोहबंद संस्कृति में तब्दील हो सत्ता प्राकृतिक संपदा की लूट का दौर चला और जैसे जैसे गैंगबंद लोगों का दबदबा लोकतांत्रिक संस्थाओं में बढा, उसके चलते हमारी महान संस्कृतिक, संस्कार, शिक्षा, स्वास्थ, कृषि, सुरक्षा, अर्थनीतियांे का जनाजा उठना शुरू हो गया। कहीं सत्ता वियोग में मातम मनाने वालों की जमात बढी तो कहीं मातम को खुशहाली बता सत्ता हासिल कर सत्ता सुख उठाने वालो की जमात बढी। 
मगर आज समीक्षा के परिणाम सामने है दशमलब शून्य का अविष्कार कर ब्रहम्मांड का गणित हासिल करने वालों का धुंधला सच सामने है। तब उपनिवेषिक आंकडो संपरिपोषित प्रबुद्ध लोगों का प्रारदुर्भाव इतना है कि प्रतिभा, विद्या, विद्ववान सक्षम होने बावजूद अक्षम असफल साबित ही रहे है या फिर प्रतिशत आंकडों की पहचान से दूर ऐसे दंश भुगत रहे है। जहां प्रतिभाओं को सहज अवसर मुहैया कराने का प्रावधान नही है। बरना क्या कारण है कि साधारण से साधारण बात पर देश में कोहराम मच जाता है और टी.व्ही. चैनलों पर सुपारी किलरों की भांति देश को समझने का दौर शुरू हो जाता। सुबह से लेकर देर रात तक क्राइम के तरीकों सहित लूट, मारपीट, अपराध, सही, गलत या तिल का ताड़ बनाने का दौर शुरू हो जाता है। मगर साधारण से साधारण समाधान पर कभी भी कोई डिवेट नजर नहीं आता है। यह न तो हमारे संस्कार रहे न ही संस्कृति और न ही हमारी विरासत। अगर यो कहे कि तथाकथित प्रतिशत, अंक आधारित शिक्षा पद्धति और ब्रान्डेड छवि या फिर चालाकी चापलूसी की कालिख से पुति संस्कृति का कैनवास ऐसा बहुरंगी हो चुका है कि उसमें रंग का स्वरूप ढूढ पाना समुद्र में कोणाी तलाशने जैसा है। जो किसी भी महान सभ्यता का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। प्रबन्धन के अभाव में घिसटने पर मजबूर संस्कृति आखिर कब समृद्धि का मुकाम हासिल करेगी यह कहना फिलहाल जल्बाजी ही कहा होगा।  

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