लोकतंत्र में गिरोहबंद, संस्कृति से सियासत की मुक्ति अहम मूल सिद्धांतों की खातिर अध्यादेश लाए, सरकार राष्ट्र, राज्य, नगर, ग्राम, राजनीति में व्याप्त अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, स्वस्थ लोकतंत्र पर कलंक सत्ता सरकार सभा परिषदों के मुखियाओं का चुनाव सीधा हो बजट से पूर्व हर वर्ष सदन को सत्ता, सरकार, सभा, परिषद के निर्णय नीत, क्रियाकलाप परिणामों का मूल्यांकन तथा दो तिहाई बहुमत से पुरस्कृत, अपदस्थ दंडित करने का अधिकार
वही.एस.भुल्ले
कहते हैं मजबूत लोकतंत्र जनतंत्र में एक मजबूत समृद्ध कल्याणकारी सरकार सुरक्षित, खुशहाल, जीवन के प्रति जवाबदेह, भ्रष्टाचार मुक्त तब तक नहीं हो सकती, जब तक उसे प्रमाणिक तौर पर उसे सामर्थवान बना जवाबदेह नहीं बनाया जाता और यह तभी संभव है जब सरकारों के मुखिया जनता द्वारा लोकतांत्रिक माध्यम से सीधे चुने जाये और जनता के वोट से प्राप्त जीत पश्चात वह अपने विवेक अनुसार अपनी सरकार मंत्रिमंडल का गठन कर जन, राष्ट्र, राज्य, नगर, ग्राम के विकास कल्याण समृद्धि, खुशहाली का मार्ग अपनी सरकार की नीति, योजनाओं के माध्यम प्रस्त कर सके तथा हर वर्ष बजट से पूर्व का रिपोर्ट कार्ड परिणामों के रूप में सदन में मूल्यांकन हेतु रखें। सदन को अधिकार हो कि वह अपने दो तिहाई बहुमत के आधार पर सहमति, असहमति दर्ज करा सरकार को पुरस्कृत करें या ठोस प्रमाण नीति के आधार पर सरकार के विरोध में मतदान कर मुखिया के खिलाफ संवैधानिक कार्यवाही का आगाज करें।
जिससे अघोषित रूप से किसी भी लोकतंत्र, जनतंत्र में जन्म लेने वाली गिरोहबंद संस्कृति में व्याप्त अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार जैसी बुराईयां से लोकतंत्र-जनतंत्र के मूल सिद्धांत और राजनीति में जीवन, मूल्यों की रक्षा हो सके। मगर यह तभी संभव है जब अध्यादेश के माध्यम से राष्ट्र, राज्य, नगर, परिषद, ग्राम, सरकारों के चुने जाने वाली प्रक्रिया में संशोधन हो। क्योंकि जनता द्वारा सरकार के मुखियाओं को सीधे न चुना जाना और चुने हुये जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकारों का अस्तित्व में आना, दबाव, मंहगे चुनाव, भ्रष्टाचार, सियासी सौदे बाजी जैसी बुराईयों का जन्म स्वतः ही हो जाता है जो कई मर्तवा हमारी व्यवस्था के सामने आ चुकी है। जिसने समूची सियासत के मायने ही आज लोकतंत्र में पलट कर रख दिये है। अगर उदाहरण बतौर हम देखें तो विगत 30 वर्षों की राजनीति में राष्ट्र विभिन्न राज्य, नगर, परिषदों की सरकार के रूप में आम जनमानस ने जो दंश सेवा कल्याण के नाम होने वाली अघोषित सौदेबाजी और सम्मानित संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के उजागर हुये कलंकित कृत्यों के रूप में सामने आते रहे है। वे किसी से छिपे नहीं। कौन नहीं जानता स्वर्गीय राजीव गांधी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार और वर्तमान में मौजूद नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के बीच के कालखण्ड में गठित बंधन-गठबंधन वाली सरकारों से इस महान राष्ट्र व इसके लोकतंत्र को क्या हासिल हुआ और आज भी राष्ट्र को समर्पित सरकार के मुखियाओं को अपने ही देश में राष्ट्र हित में लिए गए निर्णय के लिए क्या-क्या नहीं सुनना पड़ता। अगर हम मध्यप्रदेश में देखे तो आज मध्यप्रदेश में सीधे तौर पर होने वाले नगरीय सरकार के मुखियाओं के चुनाव निर्णय ले, सदस्य आधारित कर दिए गए है। इससे सियासी नफा नुकसान अलग होना एक अलग बात है। मगर इससे न तो आमजन, हमारे मूल सिद्धांत और जीवन मूल्यों को संरक्षित करने वाली सियासत, न ही नगरों का भला होने वाला है। क्योंकि इससे तथाकथित गिरोहबंद, संस्कृति, राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलने वाला है। यह अलग बात है कि मौजूदा सरकार और उसके मुखिया प्राप्त मध्य प्रदेश में कुल मत के कलंक से बच जाए। मगर लोकतंत्र और आम जन, नगर, गलियों का भला होने वाला नहीं। क्योंकि राजनीति के जिन मूल सिद्धांत, जीवन मूल्यों को लेकर मध्य प्रदेश सरकार की 15 साला सरकार से संघर्ष हुआ और प्रताड़ित जनता से इस बंपर जीत का खाका सियासत में खींचा गया उसने भ्रष्ट सियासत का विरोध को अघोषित रूप से इस हद तक प्रभावित कि किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका और एक बार म.प्र. की जनता को एक ऐसी लंगड़ी सरकार की सियासत को देखना पडा जो राजनीति के मूल सिद्धांत, जीवन, सुचिता पूर्ण सियासत को बचाने में अक्षम, असफल साबित हो रही है। परिणाम कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे सत्याग्रही और मूल सिद्धांतों तथा जीवन मूल्यों की राजनीति का झंडा उठा भले ही 15 वर्षों तक अपने दल के लिए सत्ता की खातिर संघर्ष करते रहे। मगर सच यह है कि न तो उन्हें सरकार और न ही संगठन में उनके कद अनुरूप उन्हें सेवा करने का मौका मिल सका। अगरअगर मुखिया का चुनाव म.प्र. में जनता द्वारा सीधा हुआ होता तो निश्चित ही आज म.प्र. में मूल सिद्धान्त, जीवन मूल्यों की सियासत करने वाला कोई भी नेता एक मजबूत सरकार के सहारे अपने सामर्थ की सिद्धता करने में कामयाब होता। अगर केन्द्र भी सीधा चुनाव प्रधानमंत्री का हुआ होता तो राष्ट्र जनहित में लिया जाने वाले निर्णयों की खातिर मोदी सरकार को इतना समय खराब कर वेमतलब की बातों में सेवा कल्याण से इतर उलझना पडता, न ही कई अहम मुद्दों पर विपक्ष के बेमतलब के आरोपों के केन्द्र सरकार को झेलना पडता। आज जिस तरह से सामर्थवान, ऊर्जा से भरे युवा नेताओं को सरकार की खातिर परदे के पीछे से होने वाली गिरोहबंद सियासत के चलते निराश, हताश होना पड रहा है और जिस तरह से सरपट दौडने वाली केन्द्र सरकार के नेतृत्व को सियासी उलझनों से जूझना पड रहा है उसके बजाये वह वर्ष में एक बार अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड सदन में प्रस्तुत कर अपनी सियासी जबावदेही सिद्ध कर राष्ट्र जन हित मंे स्वयं का सामर्थ, सार्थकता सिद्ध करने में कामयाब होते। उदाहरण बतौर आज महान राष्ट्र के कई राज्य, नगर, महानगर, सभा, परिषदों के परिणाम हमारे बीच मौजूद है। उन पर चर्चा हो सकती है। मगर हमारी सिद्धता तभी सार्थक होगी जब समय अनुसार सत्य को साक्षी मान हम निर्णय लेने और निर्णयो ंमें सार्थक बदलाव करने में सक्षम साबित हो और सार्थक प्रयासों की दिशा में आगे बढ सके। जय स्वराज
कहते हैं मजबूत लोकतंत्र जनतंत्र में एक मजबूत समृद्ध कल्याणकारी सरकार सुरक्षित, खुशहाल, जीवन के प्रति जवाबदेह, भ्रष्टाचार मुक्त तब तक नहीं हो सकती, जब तक उसे प्रमाणिक तौर पर उसे सामर्थवान बना जवाबदेह नहीं बनाया जाता और यह तभी संभव है जब सरकारों के मुखिया जनता द्वारा लोकतांत्रिक माध्यम से सीधे चुने जाये और जनता के वोट से प्राप्त जीत पश्चात वह अपने विवेक अनुसार अपनी सरकार मंत्रिमंडल का गठन कर जन, राष्ट्र, राज्य, नगर, ग्राम के विकास कल्याण समृद्धि, खुशहाली का मार्ग अपनी सरकार की नीति, योजनाओं के माध्यम प्रस्त कर सके तथा हर वर्ष बजट से पूर्व का रिपोर्ट कार्ड परिणामों के रूप में सदन में मूल्यांकन हेतु रखें। सदन को अधिकार हो कि वह अपने दो तिहाई बहुमत के आधार पर सहमति, असहमति दर्ज करा सरकार को पुरस्कृत करें या ठोस प्रमाण नीति के आधार पर सरकार के विरोध में मतदान कर मुखिया के खिलाफ संवैधानिक कार्यवाही का आगाज करें।जिससे अघोषित रूप से किसी भी लोकतंत्र, जनतंत्र में जन्म लेने वाली गिरोहबंद संस्कृति में व्याप्त अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार जैसी बुराईयां से लोकतंत्र-जनतंत्र के मूल सिद्धांत और राजनीति में जीवन, मूल्यों की रक्षा हो सके। मगर यह तभी संभव है जब अध्यादेश के माध्यम से राष्ट्र, राज्य, नगर, परिषद, ग्राम, सरकारों के चुने जाने वाली प्रक्रिया में संशोधन हो। क्योंकि जनता द्वारा सरकार के मुखियाओं को सीधे न चुना जाना और चुने हुये जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकारों का अस्तित्व में आना, दबाव, मंहगे चुनाव, भ्रष्टाचार, सियासी सौदे बाजी जैसी बुराईयों का जन्म स्वतः ही हो जाता है जो कई मर्तवा हमारी व्यवस्था के सामने आ चुकी है। जिसने समूची सियासत के मायने ही आज लोकतंत्र में पलट कर रख दिये है। अगर उदाहरण बतौर हम देखें तो विगत 30 वर्षों की राजनीति में राष्ट्र विभिन्न राज्य, नगर, परिषदों की सरकार के रूप में आम जनमानस ने जो दंश सेवा कल्याण के नाम होने वाली अघोषित सौदेबाजी और सम्मानित संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के उजागर हुये कलंकित कृत्यों के रूप में सामने आते रहे है। वे किसी से छिपे नहीं। कौन नहीं जानता स्वर्गीय राजीव गांधी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार और वर्तमान में मौजूद नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के बीच के कालखण्ड में गठित बंधन-गठबंधन वाली सरकारों से इस महान राष्ट्र व इसके लोकतंत्र को क्या हासिल हुआ और आज भी राष्ट्र को समर्पित सरकार के मुखियाओं को अपने ही देश में राष्ट्र हित में लिए गए निर्णय के लिए क्या-क्या नहीं सुनना पड़ता। अगर हम मध्यप्रदेश में देखे तो आज मध्यप्रदेश में सीधे तौर पर होने वाले नगरीय सरकार के मुखियाओं के चुनाव निर्णय ले, सदस्य आधारित कर दिए गए है। इससे सियासी नफा नुकसान अलग होना एक अलग बात है। मगर इससे न तो आमजन, हमारे मूल सिद्धांत और जीवन मूल्यों को संरक्षित करने वाली सियासत, न ही नगरों का भला होने वाला है। क्योंकि इससे तथाकथित गिरोहबंद, संस्कृति, राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलने वाला है। यह अलग बात है कि मौजूदा सरकार और उसके मुखिया प्राप्त मध्य प्रदेश में कुल मत के कलंक से बच जाए। मगर लोकतंत्र और आम जन, नगर, गलियों का भला होने वाला नहीं। क्योंकि राजनीति के जिन मूल सिद्धांत, जीवन मूल्यों को लेकर मध्य प्रदेश सरकार की 15 साला सरकार से संघर्ष हुआ और प्रताड़ित जनता से इस बंपर जीत का खाका सियासत में खींचा गया उसने भ्रष्ट सियासत का विरोध को अघोषित रूप से इस हद तक प्रभावित कि किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका और एक बार म.प्र. की जनता को एक ऐसी लंगड़ी सरकार की सियासत को देखना पडा जो राजनीति के मूल सिद्धांत, जीवन, सुचिता पूर्ण सियासत को बचाने में अक्षम, असफल साबित हो रही है। परिणाम कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे सत्याग्रही और मूल सिद्धांतों तथा जीवन मूल्यों की राजनीति का झंडा उठा भले ही 15 वर्षों तक अपने दल के लिए सत्ता की खातिर संघर्ष करते रहे। मगर सच यह है कि न तो उन्हें सरकार और न ही संगठन में उनके कद अनुरूप उन्हें सेवा करने का मौका मिल सका। अगरअगर मुखिया का चुनाव म.प्र. में जनता द्वारा सीधा हुआ होता तो निश्चित ही आज म.प्र. में मूल सिद्धान्त, जीवन मूल्यों की सियासत करने वाला कोई भी नेता एक मजबूत सरकार के सहारे अपने सामर्थ की सिद्धता करने में कामयाब होता। अगर केन्द्र भी सीधा चुनाव प्रधानमंत्री का हुआ होता तो राष्ट्र जनहित में लिया जाने वाले निर्णयों की खातिर मोदी सरकार को इतना समय खराब कर वेमतलब की बातों में सेवा कल्याण से इतर उलझना पडता, न ही कई अहम मुद्दों पर विपक्ष के बेमतलब के आरोपों के केन्द्र सरकार को झेलना पडता। आज जिस तरह से सामर्थवान, ऊर्जा से भरे युवा नेताओं को सरकार की खातिर परदे के पीछे से होने वाली गिरोहबंद सियासत के चलते निराश, हताश होना पड रहा है और जिस तरह से सरपट दौडने वाली केन्द्र सरकार के नेतृत्व को सियासी उलझनों से जूझना पड रहा है उसके बजाये वह वर्ष में एक बार अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड सदन में प्रस्तुत कर अपनी सियासी जबावदेही सिद्ध कर राष्ट्र जन हित मंे स्वयं का सामर्थ, सार्थकता सिद्ध करने में कामयाब होते। उदाहरण बतौर आज महान राष्ट्र के कई राज्य, नगर, महानगर, सभा, परिषदों के परिणाम हमारे बीच मौजूद है। उन पर चर्चा हो सकती है। मगर हमारी सिद्धता तभी सार्थक होगी जब समय अनुसार सत्य को साक्षी मान हम निर्णय लेने और निर्णयो ंमें सार्थक बदलाव करने में सक्षम साबित हो और सार्थक प्रयासों की दिशा में आगे बढ सके। जय स्वराज
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