सत्य से विमुख सियासत, दमन को तैयार संकट में गांधी का सत्य सिंगार के सच से बौखलाई सियासत सड़क पर

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  
म.प्र. में टूटती जन, जनप्रतिनिधि, तंत्र की आशा-आकांक्षाआंें के बीच सियासी दखल को लेकर सत्ता में जिस तरह का घमासान मचा है उसका अंदाजा एक मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से कहे गये सच से लगाया जा सकता है। वहीं काॅग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के सत्य के समर्थन में आने के बाद तथा म.प्र. के मुख्यमंत्री को सबकी बात सुनने और समाधान की बात सार्वजनिक होने के मामले में भले ही फिलहाल कोई सवाल न हो। मगर जिस तरह की चर्चा म.प्र. में अनुसूचित जनजाति से वास्ता रखने वाले मंत्री के खिलाफ कार्यवाही और काॅग्रेस आलाकमान को रिपोर्ट भेजने की चर्चा सरगर्म है तथा जिस तरह से सत्य का दमन करने सड़क पर सियासी विरोध देखने में आया उसे देखकर कहा जा सकता है कि गांधी जी की पार्टी में गांधी विचार का विरोध सत्ता के लिये इस स्तर तक जा सकता है यह साफ है। 
ज्ञात हो कि विगत महीनों से नई सरकार में जिस तरह ट्रांसपर पोस्टिंग और सरकार संचालन की चर्चायें आम हुई है। उन्होंने सत्य की सियासत को स्वतः ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। अगर सियासी पंडितों की माने तो उनका कहना साफ है कि जिन लोगों को देखकर मृत प्रायः काॅग्रेस को म.प्र. के गांव, गली, गरीब, किसान ने वोट दिया था आज उसमें से काॅग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ने तो सत्य को सुनने की सिर्फ बात भर दौहराई है। मगर पूर्व काॅग्रेस आलाकमान राहुल गांधी जिन्होंने चुनावी मंचों से चींख-चींख कर युवा, बेरोजगार, गांव, गरीब, किसान की कल्याण की बात कही थी वह आज चुप है। जो काॅग्रेस के लिये सुखद संदेश नहीं। जिस आबकारी अधिकारी को मुख्यमंत्री ने एक आदिवासी मंत्री एवं कुछ स्थानीय विधायकों के विरोध के बाद हटाया है, कौन नहीं जानता कि पूर्व सरकार में 42 करोड़ के राजस्व में घालमेल करने के आरोप में उसे निलंबित किया गया था। मगर नई सरकार के आते ही उसे बहाल कर उसी क्षेत्र में पदस्थ कर दिया गया। जहां पर लोग उक्त अधिकारी की गतिविधियों से चिरपरिचित थे। 
बहरहाल यह तो सत्ता और सरकार का मामला है मगर जिस तरह की आवाजें पीडब्लूडी, नगरीय प्रशासन, परिवहन, राजस्व, आबकारी महकमें में ट्रांसपर पोस्टिंग को लेकर आम है वह किसी से छिपा नहीं। ऐसा नहीं कि म.प्र. सरकार के हर विभाग का मसला ऐसा ही हो। एक विभाग ऐसा ही है शिक्षा विभाग जिसमें हुये ट्रांसपर पोस्टिंग में बरती गई ईमानदारी और न्याय की चर्चा आम है। बहरहाल मसला म.प्र. के मुख्यमंत्री जिन्हें साफ सुथरी छवि के रूप में समूची सियासत जाना जाता है। उनकी सरकार में अघोषित रूप से चल रहे हस्तक्षेप पर सियासत फिलहाल मुखर है। अगर राजनैतिक पंडितों की माने तो काॅग्रेस पार्टी और उसके वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ न्याय करने में अक्षम, असफल साबित हुये उनसे न्याय की उम्मीद न के बराबर नजर आती है। देखना होगा कि म.प्र. के मुख्यमंत्री और काॅग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस समूचे प्रकरण और म.प्र. की सत्ता और सियासत को कैसे दुरूस्त कर पाती है। 

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