समय गंवाती सरकार, रोजगार को भटकते लाखों बेरोजगार
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाम्इस समाचार सेवा।
म.प्र. में रोजगार और संवेदनशील समाधान युक्त लीडरसिप और सियासत की यूं तो कमी म.प्र. में रही है। परिणाम कि आज तक म.प्र. जैसा प्राकृतिक नैसर्गिक रूप से समृद्ध राज्य न तो आज तक औद्योगिक हब बन सका, न ही ऐसे प्रशिक्षित हाथ तैयार कर तीनों स्तरों पर शिक्षा, तकनीक, कुशल, अकुशल लोगों को संसाधन जुटा मौजूद म.प्र. की प्रतिभाओं को जौहर दिखाने के अवसर मुहैया करा सका। जिससे म.प्र. खुशहाल और समृद्ध बन पाता, न ही म.प्र. के सत्ता में रहे नेतृत्व म.प्र. के चहुमुखी विकास का कोई ऐसा खांका खींच सका सिवाये चापलूस भरी सियासत और धूर्त राजनीति सहित रोजगार के नाम प्राकृतिक संपदा और विकास निर्माण के नाम सार्वजनिक धन की लूटपाट के जिसका दुष्परिणाम 70 वर्ष तक तो मौजूद पीड़ियां झेलती ही रहीं भविष्य भी अगर ऐसा ही बना रहे तो इसमें कोई अतिसंयोक्ति नहीं होना चाहिए।
अपने-अपने अहम अहंकार में डूबी सत्तायें, संगठन उनके मातहत या फिर सियासी दरबारियों ने विकास, सेवा कल्याण के नाम भले ही म.प्र. के भोले भाले लोगों को बरगला समृद्ध, खुशहाल जीवन का सपना दिखा सत्ता दोहन के माध्यम से स्वयं सशक्त समृद्ध बन सतत सत्ता में बने रहने का स्वयं का रास्ता साफ किया हो। मगर म.प्र. के गांव, गली, गरीब, नगर, शहर का भला नहीं हो सका, न ही उन घरों तक समृद्धि, खुशहाली का मार्ग प्रस्त हो सका। जिनके पूर्वज सिर्फ इसी उम्मीद में एक आदर्श नागरिक की तरह भूखे प्यासे आभावग्रस्त रहने के बावजूद अपनी कमाई का बहुमूल्य अंश टेक्स के रूप में तथा सरकार बनाने अपना बहुमूल्य वोट अपनों के सपनों को पूरा करने देते रहे। परिणाम कि आज गांव, गली से लेकर नगर शहरों और सरकारों की चैखट पर रोजगार और नैसर्गिक सुविधाओं को लेकर हाहाकार मचा है। मजे की बात तो यह है कि चुनाव के दौरान हर जिला स्तर पर उद्योग स्थापित करने वालों की हालात यह है कि एक वर्ष पूरा होने को है उनकी सरकार बने। मगर बेरोजगारी से निवटने अभी तक ख, ग, घ भी शुरू नहीं हुआ है। काॅरपोरेट पेटर्न पर संचालित सत्ता का आलम यह है कि उसे फिलहाल अपनों से ही कड़ी स्पर्धाकर सत्ता बनाये रखने के फाॅरमूले से जूझना पड़ रहा है। सत्ता बंटबारे के नाम कई फाड़ में बंटी सत्ता का संचालन कौन कर रहा है यह भी यक्ष सवाल म.प्र. में बना हुआ है। कारण साफ है कि सियासी तौर पर म.प्र. में पनपती गिरोहबंद सियासी परम्परा किसी भी दल को सत्ता या सतत सत्ता में तो बनाये रख सकती है। मगर न तो खाली हाथों को रोजगार, न ही प्रशिक्षण केन्द्र, उद्योग, प्रतिभा, संरक्षण सहित नैसर्गिक कौशल को सम्र्बधित कर उन लोगों का जीवन समृद्ध खुशहाल बना सकती है। जिनकी आंखे बेहतर समृद्ध खुशहाल जीवन के सपने देखते देखते पथरा चुकी है।
समय गंवाती सरकार के हित में होगा कि वह सियासत छोड़ उस समाधान में जुटे जिसके लिये आमजन ने अपना बहुमूल्य वोट देकर उसे सत्ता में बैठाया है। अगर जल्द ही सरकार ने अपने नैतिक कत्र्तव्यों का पालन कर और अघोषित रूप से सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों की लूट में जुटे लोगों पर कड़ी कार्यवाही नहीं की। तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों का मौजूद सियासी दलों से विश्वास उठने पर मजबूर होगा।
विलेज टाम्इस समाचार सेवा।
म.प्र. में रोजगार और संवेदनशील समाधान युक्त लीडरसिप और सियासत की यूं तो कमी म.प्र. में रही है। परिणाम कि आज तक म.प्र. जैसा प्राकृतिक नैसर्गिक रूप से समृद्ध राज्य न तो आज तक औद्योगिक हब बन सका, न ही ऐसे प्रशिक्षित हाथ तैयार कर तीनों स्तरों पर शिक्षा, तकनीक, कुशल, अकुशल लोगों को संसाधन जुटा मौजूद म.प्र. की प्रतिभाओं को जौहर दिखाने के अवसर मुहैया करा सका। जिससे म.प्र. खुशहाल और समृद्ध बन पाता, न ही म.प्र. के सत्ता में रहे नेतृत्व म.प्र. के चहुमुखी विकास का कोई ऐसा खांका खींच सका सिवाये चापलूस भरी सियासत और धूर्त राजनीति सहित रोजगार के नाम प्राकृतिक संपदा और विकास निर्माण के नाम सार्वजनिक धन की लूटपाट के जिसका दुष्परिणाम 70 वर्ष तक तो मौजूद पीड़ियां झेलती ही रहीं भविष्य भी अगर ऐसा ही बना रहे तो इसमें कोई अतिसंयोक्ति नहीं होना चाहिए।
अपने-अपने अहम अहंकार में डूबी सत्तायें, संगठन उनके मातहत या फिर सियासी दरबारियों ने विकास, सेवा कल्याण के नाम भले ही म.प्र. के भोले भाले लोगों को बरगला समृद्ध, खुशहाल जीवन का सपना दिखा सत्ता दोहन के माध्यम से स्वयं सशक्त समृद्ध बन सतत सत्ता में बने रहने का स्वयं का रास्ता साफ किया हो। मगर म.प्र. के गांव, गली, गरीब, नगर, शहर का भला नहीं हो सका, न ही उन घरों तक समृद्धि, खुशहाली का मार्ग प्रस्त हो सका। जिनके पूर्वज सिर्फ इसी उम्मीद में एक आदर्श नागरिक की तरह भूखे प्यासे आभावग्रस्त रहने के बावजूद अपनी कमाई का बहुमूल्य अंश टेक्स के रूप में तथा सरकार बनाने अपना बहुमूल्य वोट अपनों के सपनों को पूरा करने देते रहे। परिणाम कि आज गांव, गली से लेकर नगर शहरों और सरकारों की चैखट पर रोजगार और नैसर्गिक सुविधाओं को लेकर हाहाकार मचा है। मजे की बात तो यह है कि चुनाव के दौरान हर जिला स्तर पर उद्योग स्थापित करने वालों की हालात यह है कि एक वर्ष पूरा होने को है उनकी सरकार बने। मगर बेरोजगारी से निवटने अभी तक ख, ग, घ भी शुरू नहीं हुआ है। काॅरपोरेट पेटर्न पर संचालित सत्ता का आलम यह है कि उसे फिलहाल अपनों से ही कड़ी स्पर्धाकर सत्ता बनाये रखने के फाॅरमूले से जूझना पड़ रहा है। सत्ता बंटबारे के नाम कई फाड़ में बंटी सत्ता का संचालन कौन कर रहा है यह भी यक्ष सवाल म.प्र. में बना हुआ है। कारण साफ है कि सियासी तौर पर म.प्र. में पनपती गिरोहबंद सियासी परम्परा किसी भी दल को सत्ता या सतत सत्ता में तो बनाये रख सकती है। मगर न तो खाली हाथों को रोजगार, न ही प्रशिक्षण केन्द्र, उद्योग, प्रतिभा, संरक्षण सहित नैसर्गिक कौशल को सम्र्बधित कर उन लोगों का जीवन समृद्ध खुशहाल बना सकती है। जिनकी आंखे बेहतर समृद्ध खुशहाल जीवन के सपने देखते देखते पथरा चुकी है।
समय गंवाती सरकार के हित में होगा कि वह सियासत छोड़ उस समाधान में जुटे जिसके लिये आमजन ने अपना बहुमूल्य वोट देकर उसे सत्ता में बैठाया है। अगर जल्द ही सरकार ने अपने नैतिक कत्र्तव्यों का पालन कर और अघोषित रूप से सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों की लूट में जुटे लोगों पर कड़ी कार्यवाही नहीं की। तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों का मौजूद सियासी दलों से विश्वास उठने पर मजबूर होगा।

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