अंधी, बेहरी व्यवस्था और विचलित लोग कत्र्तव्य विमुखता के कलंग के बीच, विकास, सेवा, कल्याण का महाकुंभ खबर अपुष्ट है.......
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अब इसे हम अपनी व्यवस्था का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि मुंह मांगी कीमत पर देश के करोडों पीड़ित, वंचित, अभावग्रस्त जन का धन चुकाने के बावजूद अपनी ही व्यवस्था में अंधे, बेहरे बैवस जबावदेह लोगों के बीच कत्र्तव्य विमुख कलंकित होती व्यवस्था के चलते सेवा विकास कल्याण के नाम कलफने मजबूर हजारों करोड़ की सड़कों, पुल, पुलियों के सरेयाम उड़ते परखच्चे, बगैर सेवा शुल्क अचेत सेवा और आंकड़ों में दम तोड़ता कल्याण, सेवा विकास के नाम कत्र्तव्यनिष्ठा से इतर जबावदेह लोगों का चीखना चिल्लाना किसी से छिपा नहीं।
अगर पुष्ट व्यवस्था की यह अपुष्ट खबर आज की व्यवस्था में भले ही कोई मायने न रखती हो। मगर रोजगार, विकास के नाम अघोषित रूप से सत्ता और तंत्र का इन क्षेत्रों में कब्जा इस बात का प्रमाणिक सेवायें या प्रमुख पदों पर रहे बड़े लोगों के साथ अघोषित हिस्सेदारी से विगत दशक में सत्ता या प्रशासनिक ओहदेे पर रहने वालों की अटूट समृद्धि अवश्य बड़ी शहर-शहर कोठिया, फार्म हाउस, कम्पनियों में अघोषित निवेश भागीदारी, लग्झरी वाहनों मंहगी ज्वेलरी की दास्ता सच समझने काफी है। जो ईओडब्लू लोकायक्त, सीबीआई ईडी के छापों में मिलने वाली मिलकियत से प्रमाणिक है। मगर जहां तथा सेवा कल्याण का सवाल है तो उघोग में तब्दील शैक्षणिक, स्वास्थ्य संस्थान और बगैर अवैध शुल्क के न होने वाले वैद्य काम के सेवा प्रदाताओं की नवीन संस्कृति ने हमारी संस्कृति, संस्कारों का जनाजा उठा, सुपर्दे खांक करने की ठान रखी है। ऐसे में कैसे स्वस्थ, समृद्ध, समाज बनेगा और कैसे लोगों का जीवन खुशहाल होगा कहना मुश्किल। मगर विकास, सेवा, कल्याण का यह महाकुंभ जनाकांक्षाओं के सैलाब में पूरे श्रद्धा भाव के साथ चल रहा है। कौन नहीं जानता नगर से लेकर गांव और पगडन्डियों से लेकर अरबों से निर्मित हाईवों का क्या हाल है। कितनी मंहगी शिक्षा, स्वास्थ सेवा आज हमारे बीच मौजूद है। मगर खबर अपुष्ट है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अब इसे हम अपनी व्यवस्था का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि मुंह मांगी कीमत पर देश के करोडों पीड़ित, वंचित, अभावग्रस्त जन का धन चुकाने के बावजूद अपनी ही व्यवस्था में अंधे, बेहरे बैवस जबावदेह लोगों के बीच कत्र्तव्य विमुख कलंकित होती व्यवस्था के चलते सेवा विकास कल्याण के नाम कलफने मजबूर हजारों करोड़ की सड़कों, पुल, पुलियों के सरेयाम उड़ते परखच्चे, बगैर सेवा शुल्क अचेत सेवा और आंकड़ों में दम तोड़ता कल्याण, सेवा विकास के नाम कत्र्तव्यनिष्ठा से इतर जबावदेह लोगों का चीखना चिल्लाना किसी से छिपा नहीं।अगर पुष्ट व्यवस्था की यह अपुष्ट खबर आज की व्यवस्था में भले ही कोई मायने न रखती हो। मगर रोजगार, विकास के नाम अघोषित रूप से सत्ता और तंत्र का इन क्षेत्रों में कब्जा इस बात का प्रमाणिक सेवायें या प्रमुख पदों पर रहे बड़े लोगों के साथ अघोषित हिस्सेदारी से विगत दशक में सत्ता या प्रशासनिक ओहदेे पर रहने वालों की अटूट समृद्धि अवश्य बड़ी शहर-शहर कोठिया, फार्म हाउस, कम्पनियों में अघोषित निवेश भागीदारी, लग्झरी वाहनों मंहगी ज्वेलरी की दास्ता सच समझने काफी है। जो ईओडब्लू लोकायक्त, सीबीआई ईडी के छापों में मिलने वाली मिलकियत से प्रमाणिक है। मगर जहां तथा सेवा कल्याण का सवाल है तो उघोग में तब्दील शैक्षणिक, स्वास्थ्य संस्थान और बगैर अवैध शुल्क के न होने वाले वैद्य काम के सेवा प्रदाताओं की नवीन संस्कृति ने हमारी संस्कृति, संस्कारों का जनाजा उठा, सुपर्दे खांक करने की ठान रखी है। ऐसे में कैसे स्वस्थ, समृद्ध, समाज बनेगा और कैसे लोगों का जीवन खुशहाल होगा कहना मुश्किल। मगर विकास, सेवा, कल्याण का यह महाकुंभ जनाकांक्षाओं के सैलाब में पूरे श्रद्धा भाव के साथ चल रहा है। कौन नहीं जानता नगर से लेकर गांव और पगडन्डियों से लेकर अरबों से निर्मित हाईवों का क्या हाल है। कितनी मंहगी शिक्षा, स्वास्थ सेवा आज हमारे बीच मौजूद है। मगर खबर अपुष्ट है।
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