जनाकांक्षाओं के आगे कठघरे में सरकार आशा-आकांक्षाओं को राहुल, सिंधिया से न्याय की दरकार

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
म.प्र. के सियासी मैदान में आक्रोश, जनाक्रोश, सत्याग्रह, रैलियों के माध्यम से भाजपा से समूचे प्रदेश में घूम घूम कर लोहा लेेने वाले काॅग्रेस महासचिव पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा चुनावों के दौरान हर जिले में उद्योग लगा रोजगार का वादा करने वाले पूर्व काॅग्रेस अध्यक्ष, सांसद राहुल गांधी, क्या जनाकांक्षाओं के आगे कठघरे में खड़ी म.प्र. सरकार से कलफती आशा आकांक्षाओं और बेरोजगार हाथों को रोजगार दिला न्याय दिला पायेंगे।
राहुल भले ही अब पूर्व काॅग्रेस अध्यक्ष व वायनाड केरल से सांसद हो और सिंधिया सत्ता, संगठन दोनों से ही म.प्र. में सीधे तौर पर बाहर हो ऐसे में राहुल और सिंधिया के नाम काॅग्रेस को वोट देने वालो का क्या अपराध जो अब एक वर्ष पूर्ण होने को है। मगर न तो हर जिले में उघोग का पता है न आशा आकांक्षाओं को इन दोनों नेताओं से बात करने का पोर्ट फोलिया मिल पा रहा है। हताश निराश कार्यकर्ता व नेता भी अब इस तलाश में है कि सत्ता सरकार में भागीदारी कर वह सेवा कल्याण, मूल्य, सिद्धान्त की राजनीति के कीर्तिमान खडा करना चाहते थे। अब उस सरकार में प्रभावी दखल ऐसे लोगों का है। जिनका 15 वर्ष के संघर्ष में कोई अता पता नहीं था। मगर आज वह प्रभावी रूप से सत्ता में काबिज है। 
बहरहाल काॅग्रेस व युवा नेताओं के नाम हुये इस छल को म.प्र. की जनता कैसे लेती है। यह तो आने वाला समय तय करेगा। मगर फिलहाल सरकार के अन्दर घुटन भरे माहौल की चीतपुकार अवश्य मंत्रियों के व्यानों के रूप में सामने आ रही है। जो म.प्र. व काॅग्रेस के भविष्य के लिये शर्मनाक ही नहीं दर्दनाक भी हों सकता है। जितना बैवस काॅग्रेस आलाकमान म.प्र. को आज चर्चा में है। शायद 70 वर्षो में रहा हो। जो न तो सरकार के अन्दर उठते तूफान को रोक पा रहा है, न ही संगठन को मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ पा रहा है। जो न तो म.प्र. के आमजन गांव, गली, गरीब के हित में कहा जा सकता नहीं काॅग्रेस के हित में।

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